अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
इस वर्ष चौबीस प्रान्तों में दो सौ चालीस टोलियाँ शक्ति साधना का आलोक लगाने देश के कोने कोने जाएंगे। इस प्रकार अखण्ड दीपक की ऊर्जा का आलोक सारे देश भर व विदेश में बैठे प्रवासी परिजनों तक सतत् पहुँचता रहेगा। इन आयोजनों से जो ऊर्जा विस्तार प्रक्रिया सम्पन्न होगी उसका चमत्कार शीघ्र ही परिजन विराट रूप में देखेंगे। इन आयोजनों के अतिरिक्त उनके लिए जो उपासना पराक्रम महाकाल की सत्ता ने निर्धारित किया है, तत्संबंधी मार्गदर्शन देने हेतु आगामी मास की अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अंक “उपासना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
यह जप सूर्योदय से प्रारम्भ होगा और सूर्यास्त तक चलता रहेगा। अखण्ड जप के समय अखण्ड दीपक प्रज्वलित रखना अनिवार्य रहेगा। अखंड जप करने वाले परिजन एक-एक घंटे की पारियों में बदलते रहेंगे। नये बैठने वाले पाटों पर रखी तश्तरी और पंचपात्र आचमनी से पवित्रीकरण करने के पश्चात् जप प्रारम्भ करते रहेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
“अंतर के निर्मल प्यार हो तुम, भगवान मेरा संसार हो तुम” वंदनीया माताजी के स्वर में गायी गई इन पंक्तियों के साथ भाव भरे वातावरण में वंदनीया माताजी का उद्बोधन समाप्त हुआ। अखण्ड दीपक के दर्शन व नमन-वन्दन के पश्चात् संध्याकाल में सभी ने नये बने प्रज्ञा रथों के 100 इंच के पर्दों पर नयी बनी तीन वीडियो फिल्में देखीं। इस वर्ष का बसंत नये संकल्प, नये उल्लास के साथ इस प्रकार सम्पन्न हुआ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
ये चौबीस वर्ष से सत्ताईस वर्ष में संपन्न किये जायँ। इस अवधि में किसी बंद कोठरी में न बैठकर रोजमर्रा का काम भी करें, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लें तथा ज्ञानार्जन कर अखण्ड दीपक जो प्रज्वलित किया है, उसकी ज्योति घर-घर पहुँचाएँ ताकि गायत्री साधना का महत्व जन-जन को समझ में आ सके। अनुष्ठान की अवधि में मात्र जौ की रोटी व छाछ पर रहना था। जौ भी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
चौबीस वर्ष तक जिसके मार्गदर्शन संरक्षण में पूज्य गुरुदेव के महापुरश्चरण संपन्न हुए वह अखण्ड दीपक यहाँ स्थापित है। उसी के प्रकाश में “अखण्ड-ज्योति” का लेखन कार्य संपन्न होता गया तथा अनेक करोड़ होता है। वंदनीया माताजी ने 16 कुमारिकाओं द्वारा यहीं अखण्ड महापुरश्चरण संपन्न कराया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
अब वे कहाँ रहे जहाँ अखण्ड दीपों की रक्षा की जाती हो। अखण्ड नियम और अखण्ड दीपक की रक्षा एक ही बात है। ये तो किन्हीं-किन्हीं ऋषियों के यहाँ और किन्हीं-किन्हीं महत्वपूर्ण व्यक्तियों के यहाँ पाई जाती है। हमने भी अखण्ड-ज्योति जलाई है, ताकि आप अखण्ड-ज्योति को और गायत्री माता को अपने कंधों पर, अपने हृदय पर रखे, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर, अपने हृदय पर रखें, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर भी उन्हें स्थापित करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
यह निर्माण पूज्यवर ने भूमि का चयन कर क्-म् में ही आरम्भ करा दिया था। परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय तप साधना की अवधि में ही परमवन्दनीया माताजी के साथ चौबीस कुमारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक के समक्ष ख्ब् करोड़ गायत्री मंत्र जप का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया। इसी के साथ नारी जागरण अभियान की आधारशिला रखी गयी। पूज्यवर के एक वर्ष बाद हिमालय से लौट कर आने पर प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों की शृंखला चली
पूर्व में एक छोटे से भवन में आरंभ यह संस्थान जिसने गायत्री महाविज्ञान जैसा गायत्री महाविद्या पर एनसाइक्लोपीडिया पर प्रकाशन किया आज एक विराट रूप ले चुका है। वह कोठरी जहाँ पूज्य गुरुदेव ने अपना अखण्ड दीपक रखा वंदनीया माताजी ने जिसकी रक्षा की एवं पूज्यवर ने कठोर तप-साधना की वैसी ही अन्दर से रखकर बाहर से सुरक्षित ढाँचे से ढंक दी गयी है। अभी भी सैकड़ों व्यक्ति इस ऊर्जाकेन्द्र के दर्शन को नित्य आते हैं। जहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका का कार्यालय था वह अब एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख से अधिक संख्या में प्रकाशित अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
वैचारिक प्रदूषण से भरे इस जमाने में ‘इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य’ का नारा लेकर सबके अन्दर आशावाद जगाने वाली यह एकमात्र ऐसी विचार-सम्पदा है, जो हमें सही सोचने, स्वयं को व्यवस्थित जीवन जीना सीखने की कला के सूत्र प्रदान करती है। 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक की ऊर्जा से मार्गदर्शन प्राप्त कर सतत् अपनी ज्योति प्रज्वलित रख प्रकाशित होती आ रही यह पत्रिका इस अंक के साथ अब अपने नये वर्ष में इसमें प्राणऊर्जा का प्रवाह और उद्दात्त व प्रचण्ड वेग के साथ बहता देखा जा सकेगा। व्यक्ति, परिवार, समाज-निर्माण की बहुमुखी विधा पर बहुविध मार्गदर्शन परिजन इसके माध्यम से पा सकेंगे। युगपरिवर्तन कैसे हो रहा है? कैसे अगले दिनों होने जा रहा है, इसकी एक झाँकी इसमें प्रत्यक्ष अभी भी देखी जा सकती है, आगे और स्पष्ट रूप से देखी जा सकेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
इसी ऊहापोह में विगत माह यह स्तम्भ छपने में जाने से रह गया। यह शृंखला अब पुनः आरंभ करते हैं-इस आश्वासन के साथ कि महाकाल की प्रज्वलित यह ज्योति जो अखण्ड दीपक के प्रकाश से अनुप्राणित है, सत्परामर्श द्वारा लोगों को सत्पथ दिखाने का कार्य अनवरत करती रहेगी। प्राण ऊर्जा सूक्ष्म संरक्षण दे रही गुरुसत्ता की ही मूल में है। उसी की शक्ति से यह ज्योति प्रज्वलित है एवं अगणित निराशा के अंधकार में भटकने वालों के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ की तरह है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
फिर पूछा, “और कन्या की उम्र कितनी हो? “श्रीराम ने उत्तर दिया, “कम-से-कम बारह वर्ष। हम जानते है कि अखण्ड दीपक की देख-भाल और गोसेवा के लिए आपको बहू की जरूरत है, पर शास्त्र मर्यादा का पालन भी तो होना चाहिए। ”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
यह पत्रिका परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी की प्राणचेतना की संवाहिका है। सभी को यह ज्ञात है कि 1926 ईसवी की बसंत पंचमी (18 जनवरी) की पावन वेला में सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के निर्देशानुसार एक अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित किया गया था। यह अखण्ड दीप तब से निरंतर जल रहा है एवं विगत तैंतीस वर्षों से गायत्री तीर्थ-शाँतिकुँज में स्थापित है। मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण इस अखण्ड दीपक की साक्षी में ही किए गए
‘अखण्ड ज्योति’ युगधर्म को महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड दीपक का एक प्रतीक बनी। इस पावन प्रतीक द्वारा ही युग परिवर्तन की आँधी ने जन्म लिया है। आज जनसामान्य का एक बहुत बड़ा तबका, नारीशक्ति एवं युवावर्ग आशावादी हो चला है तो उसके मूल में ‘अखण्ड ज्योति’ की भूमिका नकारी नहीं जा सकती
यह अखण्ड दीप तब से निरंतर जल रहा है एवं विगत तैंतीस वर्षों से गायत्री तीर्थ-शाँतिकुँज में स्थापित है। मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण इस अखण्ड दीपक की साक्षी में ही किए गए। ‘अखण्ड ज्योति’ उसी का परिणाम है। कठोर गायत्री तप के माध्यम से युवा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी समन्वयात्मक तर्क, तथ्य, प्रमाणों सहित परोक्षजगत की विधि व्यवस्था एवं आर्ष वाङ्मय की युगानुकूल प्रस्तुति इसकी विशेषता रही है, जिसने छात्र, अध्यापक, प्रस्तुति एवं प्रबुद्धवर्ग, सभी को अपनी ओर खींचा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
गुरुदेवश्री 20 जून को शाम आठ बजे माताजी व अखण्ड दीपक के साथ आए एवं दस दिन बाद सबको सोता छोड़ अज्ञातवास के लिए विदा हो गए। एक साल बाद वे हिमालय से लौटे। आते ही युगतीर्थ का विस्तार, कन्या प्रशिक्षण, प्राण− प्रत्यावर्तन, विदेशयात्रा एवं विभिन्न शिविरों के क्रम में लग गए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
एक सहारा मिला, जब लगभग बारह-पंद्रह वर्ष से भी कम आयु की कुँवारी कन्याएँ पूज्यवर के हिमालय रवाना होने के तुरंत बाद माताजी के पास आ गई। उन्हें छह वर्ष में मिलकर चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण अखण्ड दीपक की साक्षी में संपन्न करने थे। छोटी-छोटी अपने गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं की बच्चियाँ थीं। बहुत कुछ जीवन-व्यवहार व कठोर तप का अनुशासन माताजी को ही सिखाना पड़ा
वह भी निद्रा में व्यवधान डालता। फिर ‘अखण्ड दीपक’ की देखभाल का जिम्मा भी सबसे बड़ा था। वह कार्य भी माता जी स्वयं ही करती थी। रात्रि में उसके लिए भी उठना पड़ता, आराध्य सत्ता की याद बराबर आती रहती थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
महापुरश्चरण साधना के साथ अखण्ड ज्योति का भी अवतरण उसी दिन वसंत पंचमी पर संपन्न हुआ। तभी से यह अखण्ड दीपक प्रज्वलित है। क्रमशः आगरा, मथुरा होकर 75 वर्ष की यात्रा कर चुका है। सन 1971 से यह शाँतिकुँज, हरिद्वार में स्थापित है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
इसकी पाठ्य सामग्री के साथ वह जीवन्त ऊर्जा जुड़ी हुई है जो हमें हमारी गुरुसत्ता से प्रतिमास-प्रतिदिन-प्रतिपल अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखने का प्रयास करती है। चौबीस चौबीस कक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 से 1953 तक के समय में तथा 240 करोड़ जप के कुमारी कन्याओं के अनुष्ठान 1975 तक उस अखण्ड दीपक की उपस्थिति में संपन्न हुए है जिसकी तप ऊर्जा में ही अखण्ड ज्योति के माध्यम से करोड़ों व्यक्तियों तक पहुँचकर उनके व्यक्तित्व को बदला उन्हें परिवार समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए प्रेरित किया तथा उनके माध्यम से लोकसेवियों का एक बड़ा परिकर खड़ा करके दिखा दिया। निश्चित ही इस आलोक ऊर्जा वितरण तंत्र में अभी भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आएगी यह और भी प्रचंड प्रवाह के रूप में जन जन तक पहुँचता रहेगा व उन्हें उल्लास भरा प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन देता रहेगा
परमवंदनीया माताजी जिनने विगत भाद्रपद पूर्णिमा महालय श्रद्धारंभ की पावन बेला में स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म में प्रवेश किया सतत् उस अखण्ड दीपक में घृत बनकर परहित के निमित्त अपनी एक एक बूँद होम करनी रही जो उनकी आराध्य सत्ता ने 1926 में प्रज्वलित किया था व अब भी जल रहा है। उसी के प्रकाश में मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण संपन्न हुए। उस अखण्ड दीपक को यदि समष्टि के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाए
उसी के प्रकाश में मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण संपन्न हुए। उस अखण्ड दीपक को यदि समष्टि के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाए। ऋषियुग्म की तपः ऊर्जा का घृतरूपी स्नेह में परम वंदनीया माता जी की सत्ता का तथा बाती के प्रखर प्रकाश से परमपूज्य गुरुदेव के ब्रह्मवर्चस् का परिचय मिलता पाया जाए तो इस मिश्रण के सही स्वरूप को समझने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होगी। उसी प्रखण्ड दीपक की उनने न केवल सावधानी से देखभाल की इसकी प्रशंसा लेकर प्रकाशित होने वाली अखण्ड ज्योति जो महाकाल के प्राण प्रवाह के रूप में जन जन में अभिनव उत्साह का संचय खाली को भी संभाला

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
इसी क्षेत्र को जाने वाली द्वापर हिमालय की छाया व गंगा की गोद में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली में शांतिकुंज की स्थापना भी इस भूमि के सुसंस्कारों को दृष्टिगत रख कर ही की गयी है। न केवल स्थापना हुई है अपितु सन् 1926 से सतत् जल रहे अखण्ड दीपक की स्थापना, कुमारिकाओं द्वारा अखण्ड गायत्री जप, नित्य यज्ञ एवं करोड़ों गायत्री महामंत्र की युगसंधि महापुरश्चरण साधना द्वारा इस क्षेत्र को संस्कारित कर इसे गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित भी किया गया है। इस कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर उपासना करने वाले के प्रसुप्त संस्कार स्वयं जाग उठते हैं, दैवीसत्ता का मार्गदर्शन उसे मिलता है तथा लौकिक एवं अन्यान्य समस्याएँ स्वतः सुलझ जाती हैं। यदि शांतिकुंज को दिव्यशक्ति धारा का गोमुख कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
सतयुग के आगमन की संधि वेला में श्री अरविंद ने इसे सिद्धि वर्ष का वर्ष कहा व पाण्डिचेरी से अपने सभी परिजनों को संबोधित करके कहा कि परिवर्तन की प्रक्रिया अब तीव्र वेग लेगी। उसी वर्ष आगरा नगर से यमुना पार उसी जिले की एक तहसील एतमादपुर के छोटे से गाँव आँवलखेड़ा नामक ग्राम में जो आगरा-जलेसर मार्ग पर 15 मील की दूरी पर स्थित था, 15 वर्षीया युवा साधक श्रीराम की पूजा कोठरी में दिव्य प्रकाश के ऊर्जा पुँज के रूप में एक सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकटीकरण हुआ, जिसने उन्हें उनके पूर्व जन्मों का तथा आगामी जीवन के 65 वर्षों के कार्यकाल का बोध कराके प्राण दीक्षा दी-गायत्री महाविद्या को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 24-24 लक्ष के चौबीस वर्ष तक 24 महापुरश्चरण संपन्न करने व अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित कर उस ज्योति के प्रकाश से विश्व-वसुधा के कल्याण के निमित्त स्वयं को तपाने का निर्देश दिया। “श्रीराम मत्त” नाम से संबोधित यही युवा साधक बाद में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य-वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ-युगऋषि-प्रखर प्रज्ञा रूपेण महाकाल की संबा प्राप्त कर गायत्री परिवार के अधिष्ठाता बने तथा उनकी जीवन संगिनी बनने का सौभाग्य भगवती देवी जी को मिला, जो दीपक प्रज्ज्वल वाले वर्ष 1926 में ही जन्मीं थी। 1943 में विवाह के बाद पहले आँवलखेड़ा, फिर मथुरा और बाद के चौबीस वर्षों में वे हरिद्वार के सप्त सरोवर स्थित शाँतिकुँज में रहीं
स्थायी रूप से घर-बार छूट गया-ममत्व देने वाली माँ समान सास जिन्हें “ताईजी” कहते थे, महाप्रयाण कर गयीं, बेटी की शादी हो गयी तो वे अपनी छः गोद ली नन्ही-नन्ही पुत्रियों, जिनसे उन्हें 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण अखण्ड दीपक के समक्ष संपन्न कराने थे, को लेकर शाँतिकुँज आ गयीं। 1971 से 1990 की अवधि उनके लिए कड़ी कसौटी वाली थी, जिसकी चर्चा हम पहले के एक लेख में कर चुके हैं। यह समय पूज्यवर के परोक्ष रूप से कार्य करने का तथा परम वंदनीया माताजी के एक संगठक के रूप में आँदोलन का संचालन करने वाली मातृ शक्ति के रूप में कार्य करने वाला समय था
दोनों ने जिसे कर्मभूमि बनाया था व अखण्ड-ज्योति संस्थान (घीया मंडी मथुरा) तथा गायत्री तपोभूमि (वृन्दावन रोड मथुरा) से क्रमशः साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए। परम वंदनीया माताजी को शाँतिकुँज सप्त सरोवर हरिद्वार में अखण्ड दीपक चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने वाली छः कुमारी कन्याएँ व तीन वरिष्ठ कार्यकर्ता गणों के साथ नीरव एकाँत में रहने का निर्देश दे गए। कैसा निष्ठुर सा लगता है यह कदम एक बैरागी संत का, जिसने जीवन भर औरों के हित स्वयं को तिल-तिल कर जलाया था, अगाध स्नेह लुटाकर एक विराट् परिवार का अभिभावक कहलवाया था, किंतु ऐसा लगता भर है। यह एक सुनियोजित कार्य स्थानाँतरण की प्रक्रिया भर थी
चौबीस वर्ष के चौबीस महापुरश्चरणों का उत्तरार्ध चल रहा था। उनने गायों को जौ खिलाकर गोबर छानकर-उनसे जौ निकालकर उसकी रोटी व छाछ पूज्य गुरुदेव को खिलायी, उनके अखण्ड दीपक की रक्षा की। हर आने वाले अभ्यागत का आतिथ्य कर घर में जो भी था, उसी से उसकी व्यवस्था की। बच्चों के लिए आए दूध में पानी पड़ता जाता व उसी से चाय बनाकर दुःखी-पीड़ितों की सेवा की जाती-कष्ट सुने जाते व घावों पर मलहम लगाए जाते

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
हम जिस तप साधना के बल पर अब तक परिजनों को कठिनाइयों से बचाने और उत्कर्ष में सहयोग देने में समर्थ रहे हैं वह उत्तरदायित्व माताजी उठावेंगी। वे हरिद्वार, ऋषिकेश के बीच सप्त सरोवर के निकट “शान्तिकुँज” नामक साधना कक्ष में हमारी ही तरह अखण्ड दीपक पर 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरणों का क्रम चलावेंगी और उसी उपलब्धि के आधार पर परिवार की सेवा सहायता करने का क्रम पूर्ववत् जारी रखेंगी। बाप मर जाता है तो बच्चों को माता किसी प्रकार पाल लेती है। माँ मर जाय तो बाप के लिए छोटे बच्चे पालना कठिन पड़ता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
हिमालय की गोद और गंगा के अंचल में विनिर्मित शान्ति कुंज प्रस्तुत साधना के लिए अत्यन्त उपयोगी स्थान है। यहाँ अखण्ड दीपक, नित्य जप, नित्य हवन एवं साधनाओं का दिव्य वातावरण बना रहता है। यह केन्द्र वस्तुतः किसी महान अध्यात्म शक्ति के संरक्षण में चल रहा है। आचार्य दम्पत्ति जो उसका प्रबन्ध कार्यवाहक के रूप में करते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
हमारे व्यक्तिगत जीवन की कुछ प्रमुख और सर्वविदित घटनाएँ इस प्रकार है- (1) 24 वर्ष 24 गायत्री महापुरश्चरणों की कष्ट साध्य तपश्चर्या का श्रीगणेश (2) अखण्ड दीपक की स्थापना (3) अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन (4) गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास (5) सहस्र कुण्डीय गायत्री यज्ञ से देश भर के अध्यात्म प्रेमियों का एकत्रीकरण (6) गायत्री परिवार की स्थापना (7) वेद शास्त्र आदि आर्ष ग्रन्थों का अनुवाद प्रसारण (8) विचार क्रान्ति अभियान के लिए युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री आन्दोलन (9) अज्ञातवास घटनाएँ (10) शान्ति कुँज की स्थापना (11) युगान्तरीय चेतना के लिए सत्र-शिक्षण योजना का आरम्भ (12) महिला जागृति अभियान (13) ब्रह्म वर्चस् आरण्यक (14) अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का वह प्रयास जिसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना है। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे, दैवी प्रेरणा और समग्र समर्पण के साथ किये गये पुरुषार्थ का प्रतिफल इतना ही है जो सर्वविदित है। इनमें प्रत्येक क्रिया का शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन की हुआ है दिव्य प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने का यह मुहूर्त जितना उत्तम है उतना हमारी दृष्टि में कदाचित ही कोई हो सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
दीपक का भी और बत्तियों की कामियों निरन्तर बढ़ने से दोनों का समिधित धूम्र, बचंस, तेज तथा प्रभाव उपासना करु में वशीष वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव यह केवल अखण्ड दीपक मात्र ही नहीं रहता वरन अखण्ड यज्ञ बन जाता है। ऐसे संयोग, सम्भालने में सतर्कता बहुत रखनी पड़ती है, और व्यय भी काफी आता है। फिर भी इसका प्रतिफल बहुत है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
हरिद्वार और ऋषिकेश बीच गंगातट पर जहाँ सात ऋषि तप करते थे और गंगा की वह सात धारायें हैं, उस एकान्त भूभाग में डेढ़ एकड़ एक छोटी-सी जमीन प्राप्त कर ली गई है और उसमें फलों के पेड़ इसी वर्ष लगा दिये गये हैं। खाने को फल, शाक, पहनने को दो क्यारी कपास जिसका सूत कात कर तन ढक ले, एक गाय जिससे अखण्ड दीपक को घी मिल जाय और छाछ आहार में प्रयुक्त होती रहें एक कर्मचारी जो पेड़ पौधे और गाय संभालता रहे, रहने को चार कुटियाँ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-June
उस दिशा में श्रीगणेश तो शान्ति−कुञ्ज में हम लोगों के आगमन के समय से ही हो गया था। अखण्ड दीपक पर चल रही साधना प्रक्रिया के साथ उसका श्रीगणेश तीन वर्ष पूर्व ही हो गया था। प्रायः 25 कन्याएँ कई अति महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्राप्त करती रही है। वे अगले दिनों जहाँ भी रहेंगी वहाँ आलोक उत्पन्न करेंगी यह निश्चित है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
शिव पार्वती विवाह भी यहीं हुआ था उस विवाह की अग्नि एक चतुष्कोण कुँड में आज तक जलती रहती है। नारायण मन्दिर में अखण्ड दीपक भी जलता है। सोन प्रयाग में मन्दाकिन और वासुकी गंगा है। वासुकी नाग का निवास इन गंगा के तट पर था

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
कैमडन ने इस आश्चर्य का समाधान यह लिखकर किया है कि प्राचीन काल के रसायनवेत्ता सोने को पिघलाकर तेल जैसा बना देते थे उसी से यह दीपक सैकड़ों वर्षों तक जलते थे। सेन्ट अमास्टाइन ने अगली संस्मरण पुस्तक में लिखा है कि देवी वीनस के मन्दिर में ऐसा अखण्ड दीपक खुली जगह में जलता था जिस पर वर्षा और तेज हवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। पुरातत्व विभाग ने सन् 1840 में स्पेन कुर्तण क्षेत्र की एक कब्र को खोदकर जलता दीपक उपलब्ध किया था। उस ज्योति को कई सौ वर्षों से जलती आ रही माना गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
फिर यहाँ के वातावरण की भी विशेषता है। नित्य 24 लाख जप, नौकुण्डीय यज्ञशाला में 24 हजार आहुतियाँ, अखण्ड दीपक आदि कारणों से यहाँ साधना मय विशिष्ट वातावरण है। गायत्री के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र की यह तपस्थली है। किस साधक के लिए क्या विशेषता का समन्वय हो, इसके लिए शारीरिक, मानसिक जाँच-पड़ताल की विशेषज्ञों द्वारा विशेष व्यवस्था है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
युगनिर्माण की प्रक्रिया का बीजारोपण तो 1962 में पूज्यवर की हिमालय यात्रा से लौटने के बाद हुआ, किन्तु गायत्री परिवार के रूप में एक विराट प्रकटीकरण का शुभारम्भ अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के साथ 1926 में तंग हो चुका था जब परमपूज्य गुरुदेव की अदृश्य मार्गदर्शक सत्ता हिमालय से आकर उनके कक्ष में अवतरित हुई थी। तब से सतत् जल रहा-मिशन हर निर्धारण का साक्षी व प्रत्येक के मूल में विद्यमान रहा यह अखण्ड दीपक अपने 75 वर्ष सन् 2001 में युगसंधि महा-पुरश्चरण की अंतिम पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न करने जा रहा है। अखण्ड दीपक की हीरक जयंती के साथ युग-परिवर्तन का एक नया इतिहास लिखा जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है
तब से सतत् जल रहा-मिशन हर निर्धारण का साक्षी व प्रत्येक के मूल में विद्यमान रहा यह अखण्ड दीपक अपने 75 वर्ष सन् 2001 में युगसंधि महा-पुरश्चरण की अंतिम पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न करने जा रहा है। अखण्ड दीपक की हीरक जयंती के साथ युग-परिवर्तन का एक नया इतिहास लिखा जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
जनमानस का परिष्कार और अदृश्य जगत के अनुकूलन में जो योगदान दें, वह युगसाधना व धर्मशीलों का संगतिकरण सार्थक हैं - यही इस मिशन में चिन्तन का भावी निर्धारणों का मूल आधार बना। १९९. में परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन हो विराट रूप लेने के बाद संपन्न २७ अश्वमेध महायज्ञ, प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा एवं अभी-अभी न्यूजर्सी (यू. एस. ए.) में सम्पन्न वाजपेय यज्ञ की सफलता के मूल में उसी शक्ति को देखा जा सकता है, जिनसे लाखों - करोड़ों की मनःशक्ति का एकीकरण कर इस ब्रह्माण्ड में एक विलक्षण प्रयोग का बीजारोपण १९२६ में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के माध्यम से किया था। समूह चेतना का जागरण इसी आधार पर संभव हो पाया है। एवं अब १९९८ का अंतिम उत्तरार्द्ध का भाग आते - आते हम सबकी महाकाल की युग - प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
यदि इस मिशन का इतिहास जो सन् 1926 से अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन से आरम्भ हुआ उठाकर देखें तो शुरू से अंत साधनात्मक पुरुषार्थों द्वारा सूक्ष्मजगत का क्रुद्ध प्रकृति का सम्भावित विभीषिकाओं का शमन ही इसके मूल में दिखाई पड़ता हैं। मानों स्रष्टा ने यह विशिष्ट दायित्व उस मिशन को विशेष जिम्मेदारी के साथ सौंपा हो। परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण 1926 से आरम्भ होकर प्रायः 1952 के अंत तक चले

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
शाँतिकुँज जब बना था, तब टुकड़ों-टुकड़ों में बना था। पहले वह प्रारंभिक भाग जहाँ पूज्यवर एवं माताजी का निवास रहा है व आज अखण्ड दीपक स्थापित है, बाद में पीछे का मंदिर व गायत्रीतीर्थ वाला सप्तर्षि क्षेत्र तथा उसके बाद गायत्रीनगर, जहाँ सजल-श्रद्धा, प्रखर-प्रज्ञा सहित सभी शिक्षण भवन व आवास स्थित है। बाद में विस्तार−क्रम में समीप की और भूमि उपलब्ध होती चली गयी जो पास के कैम्पस के रूप में उभरी, जहाँ माँ भगवती भवन आचार्य भवन व देवात्मा हिमालय स्थित है। ब्रह्मवर्चस का भवन भी 1978-79 में बनकर तैयार हो गया था व उसका प्रयोगशाला-ग्रंथालय वाला स्वरूप उभरकर आ गया था

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
कुछ पलों के बाद नयन उन्मीलित हुए। सामने अखण्ड दीपक की लव का मन्द-मन्द प्रकाश उपासना गृह की इस छोटी-सी कोठरी में हिमालय का संचार कर रहा था। एक अलौकिक सुगन्ध और अद्भुत आभा अभी भी वहाँ बिखर रही थी। साधक ने उस सिद्ध ज्योति को अपने समर्थ गुरु की प्रत्यक्ष मूर्ति मान बड़ी भक्तिभाव से प्रणाम किया और उठ खड़ा हुआ
(1) इसी पावन दिन वि. संवत् 1983 सन् 1926 की वसंत पंचमी की पावन वेला में गुरुदेव को उनके सूक्ष्म-शरीरधारी मार्गदर्शक, जिन्हें हम दादा गुरुदेव (स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी) के नाम से जानते हैं, ने भागीरथी तपश्चर्या की प्रेरणा का उद्बोधन-आह्वान प्रस्तुत किया और तत्काल पूज्य गुरुदेव उन निर्देशों को शिरोधार्य करने के लिए उद्यत हो गए। उसी दिन जलाया गया अखण्ड दीपक आज भी सतत् जल रहा- शांतिकुंज से प्रकाश-प्रेरणा दे रहा है एवं उस दिन की बराबर याद दिलाता रहता है। चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला इसी दिन आरंभ की गयी थी। इसी दिन मिशन के सूत्र-संचालन तंत्र पर दिव्यप्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होता आया है, जो हर वर्ष के लिए एक नया सन्देश लेकर नवप्रभात की तरह पूज्यवर के अन्तरंग अन्तरिक्ष में आविर्भूत होता जा रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
दो दो घण्टे रोज 12 दिन तक कीर्तन करने की अपेक्षा 24 घण्टे का एक अखण्ड कीर्तन अधिक फल प्रद है। इसी प्रकार अखण्ड दीपक, अखण्ड जप, अखण्ड पाठ आदि का महत्व बहुत अधिक है। प्राचीन काल में अग्नि को घर में अखण्ड प्रज्वलित रखने की प्रथा थी पारसियों ने अब भी बड़ी श्रद्धा सावधानी एवं पवित्रता के साथ अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है ऐसी अग्नि में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो जाता है जो मनुष्य के लिए अनेक दृष्टियों से लाभ दायक सिद्ध होता है। उसकी समीपता से शरीर तथा मन को तेज, बल, उत्साह एवं पोषण प्राप्त होता है, अनेक प्रकार के विकारों को जलाने की भी ऐसी अखण्ड अग्नि में विशेष क्षमता होती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
ऐसे स्थान पर ही बना है- शान्ति कुंज आश्रम। नित्य अखण्ड दीपक के दर्शन। भाव भरे संगीत का प्रभाती श्रवण। यह सभी मिलकर बिना शिक्षण के भी व्यक्तित्व के हर स्तर को झंकृत करते है
इसी का साकार स्वरूप है- ‘अखण्ड ज्योति’। जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बना कर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह माना जाना चाहिए कि खण्डित होने वाली-निरन्तर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक का कलेवर प्रदान किया गया
साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
अपने गुरुदेव ने पूजा की कोठरी में प्रकाश के रूप में दर्शन दिये। मैंने उनका प्रकाश के रूप में दर्शन क्रिया शक्ल भी दिखायी पड़ी उसी स्मृति में हमने अखण्ड दीपक जलाये इसलिए कि वह प्रकाश मेरे जीवन में बना रहे जो पहले दिन गुरुदेव ने अपनी शक्ल और सूरत के रूप में हमें दिखायी। कही भूल न जाये कहीं पथ से दूर न हो जाये इसलिए अखण्ड दीपक के रूप में उनकी स्थापना कर दी गयी। उस प्रकाश के साथ अपना जीवन भर संपर्क और सम्बन्ध बनाये रखने के लिए
मैंने उनका प्रकाश के रूप में दर्शन क्रिया शक्ल भी दिखायी पड़ी उसी स्मृति में हमने अखण्ड दीपक जलाये इसलिए कि वह प्रकाश मेरे जीवन में बना रहे जो पहले दिन गुरुदेव ने अपनी शक्ल और सूरत के रूप में हमें दिखायी। कही भूल न जाये कहीं पथ से दूर न हो जाये इसलिए अखण्ड दीपक के रूप में उनकी स्थापना कर दी गयी। उस प्रकाश के साथ अपना जीवन भर संपर्क और सम्बन्ध बनाये रखने के लिए। गुरुदेव जब मिले तो घटना थोड़ी-सी है एक आधे घंटे की

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
हर दिन वहाँ नौ कुण्डीय यज्ञ में हजारों आहुतियाँ दी जाती हैं। यहाँ अखण्ड दीपक जलता रहता है। यहाँ हमारी और माताजी की नियमित रूप से कठोर तपश्चर्या अभी भी चलती रहती है। इससे वातावरण बनता है तो हमारे गुरुदेव परोक्ष रूप से आते ही रहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
आश्विन कृष्ण संवत् 1982, 20 सितंबर 1926 को प्रातः 8 बजे साँवलिया बोहरे (आगरा) के श्री जसवन्तराय के घर जन्मी परम वंदनीय माताजी एक दैवीसत्ता- शक्ति के रूप में ही अवतरित हुई थीं। यह मात्र संयोग ही नहीं है कि पंद्रह वर्ष की आयु में उसी वर्ष की आयु में उसी वर्ष वसंत पर्व पर उनके भावी जीवनसाथी- उनके आराध्य एवं गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने भी अपने अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन के माध्यम से अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के लगभग 16 मील दूर स्थित आँवलखेड़ा ग्राम में दर्शन किए एवं अपने तीनों जन्मों की जानकारी प्राप्त की थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि उसी वर्ष श्री अरविंद ने भागवत् चेतना का सिद्धिवर्ष इसे घोषित किया था। इस ये सारे असाधारण स्तर के संयोग बताते हैं कि ऋषियुग्म के रूप में एक दैवी चैतन्यशक्ति हम सब का मार्गदर्शन करने आई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती, खर्च करती हमारी परंपरा को जीवित रखेंगी। (1) नव निर्माण अभियान का प्रत्यक्षतः मार्गदर्शन (2) हमारी बौद्धिक एवं सर्वसाधारण को अवगत कराते रहने का माध्यम (3) अखण्ड दीपक एवं गायत्री पुरश्चरणश्रृंखला को गतिशील रखकर कष्ट पीड़ितों की सहायता-यह तीन काम माताजी के जिम्मे हैं। ’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
यही कारण है कि हर जाति, मत, सम्प्रदाय का व्यक्ति उनसे पिता की तरह स्नेह करता एवं उनकी धर्मपत्नी वंदनीय माता भगवती देवी को अपनी माता मानते हुए बदले में अनेक गुना स्नेह ढेरों अनुदान आशीर्वाद पाता रहा। यहीं पर उनने आर्षग्रन्थों का भाष्य कर उन्हें जन सुलभ बनाया, अपने वजन से भी कई गुना साहित्य रचा एवं नियमित अपनी लेखनी चलाते हुए अपनी साधना के शक्ति स्रोत अखण्ड दीपक के प्रकाश में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका एकाकी लिखी, जो कि अपनी लम्बी यात्रा पूरी कर पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी स्वर्ण जयन्ती मना चुकी है
बसन्त पर्व के ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें उनकी अशरीरधारी हिमालय वासी गुरुसत्ता जिनने उन्हें उनके जीवनोद्देश्य से परिचित कराया, भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा समझाई व बताया कि विगत जन्मों में जो महान् कार्य उनसे पूरे हुए उन्हें किस तरह पूरा किया जाना है। चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण करने, अखण्ड दीपक के प्रकाश में स्वाध्याय जन्म चिन्तन को लिपिबद्ध कर अखण्ड-ज्योति रूपी पत्रिका प्रकाशित किये जाने तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सान्निध्य में जाने, स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के नाते सहयोग देने के निर्देश आँवलखेड़ा की इस बस्ती के उनके विशाल घर की छोटी-सी पूजा की कोठरी में ही मिले। यहीं पर उन्होंने बतलाया गया कि साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है
हम सबके जीवन का एक सुयोग-सौभाग्य कि जिन दिनों परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीय माता जी का अवतरण इस धरती पर हुआ, उन्हीं दिनों हम सब को भी उनके साथ लीला सहचर बनने का एक स्वर्णिम अवसर मिला। हम सबने उनके नूतन सृष्टि के सृजन के संकल्प को 1926 की बसंत पंचमी का प्रचलित अखण्ड दीपक के उजाले में साकार होते देखा। गायत्री जयन्ती 1990 (2 जून) को हमारी आराध्य गुरुसत्ता हम सबको प्रचण्ड संकल्प शक्ति से अभिप्रेरित कर अपने बाद शक्ति स्वरूपा परम वंदनीय माताजी एवं उनके बाद संघशक्ति की प्रतीक ‘लाल मशाल' को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर इक्कीसवीं सदी की सारी भवितव्यतायें बताकर महाप्रयाण कर गयीं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
प्रत्येक जप के साथ प्रत्येक माला के साथ प्रत्येक उपकरण के साथ जप कर लिया करूँ जो कर्मकाण्ड मुझे बताया गया उसमें दीपक के रूप में मैंने एक अखण्ड दीपक की स्थापना की। अखण्ड दीपक जलाया बेशक, लेकिन, साथ-साथ में भावनाओं को भी तदनुरूप बनाया जिस तरीके से अखण्ड दीपक अखण्ड जलता रहता है बुझता नहीं उसी तरीके से हमारा जीवन प्रवाह ज्ञानमय हो, बुझने न पाये, टूटने न पाये श्रृंखला बिगड़ने न पाये। बीच-बीच में हमको अधःपतन की ओर गिरने का मौका न आये, ठोकरें नहीं लगे, चोट नहीं लगें और इस प्रकार निर्धारित नियत और सुनिश्चित निशान की ओर हम बढ़ते हुए चले जायें और दीपक के तरीके से प्रकाशवान होकर प्रकाश पैदा करें, अपने भीतर प्रकाश पैदा करें और अपने बाहर भी। स्नेह से भरे हुए रहें, सद्भावनाओं से भरे हुए रहें-यही तो सब दीपक के संदेश थे
स्नेह से भरे हुए रहें, सद्भावनाओं से भरे हुए रहें-यही तो सब दीपक के संदेश थे। अखण्ड दीपक जलाया गया और वह इम्तहान का दीपक मेरे भीतर और बाहर भी जलता रहा। हर जगह उसकी प्रेरणायें आगे विकसित होती हुई चली गयीं। 24 वर्ष इसी प्रकार से निकल गये
गायत्री का मैंने जप तो किया, लेकिन जप के साथ-साथ में यह भी ध्यान रखा कि वह विचारणाएँ, शिक्षायें और प्रेरणायें मेरे हृदयंगम होती रहें। प्रत्येक जप के साथ प्रत्येक माला के साथ प्रत्येक उपकरण के साथ जप कर लिया करूँ जो कर्मकाण्ड मुझे बताया गया उसमें दीपक के रूप में मैंने एक अखण्ड दीपक की स्थापना की। अखण्ड दीपक जलाया बेशक, लेकिन, साथ-साथ में भावनाओं को भी तदनुरूप बनाया जिस तरीके से अखण्ड दीपक अखण्ड जलता रहता है बुझता नहीं उसी तरीके से हमारा जीवन प्रवाह ज्ञानमय हो, बुझने न पाये, टूटने न पाये श्रृंखला बिगड़ने न पाये। बीच-बीच में हमको अधःपतन की ओर गिरने का मौका न आये, ठोकरें नहीं लगे, चोट नहीं लगें और इस प्रकार निर्धारित नियत और सुनिश्चित निशान की ओर हम बढ़ते हुए चले जायें और दीपक के तरीके से प्रकाशवान होकर प्रकाश पैदा करें, अपने भीतर प्रकाश पैदा करें और अपने बाहर भी
प्रत्येक जप के साथ प्रत्येक माला के साथ प्रत्येक उपकरण के साथ जप कर लिया करूँ जो कर्मकाण्ड मुझे बताया गया उसमें दीपक के रूप में मैंने एक अखण्ड दीपक की स्थापना की। अखण्ड दीपक जलाया बेशक, लेकिन, साथ-साथ में भावनाओं को भी तदनुरूप बनाया जिस तरीके से अखण्ड दीपक अखण्ड जलता रहता है बुझता नहीं उसी तरीके से हमारा जीवन प्रवाह ज्ञानमय हो, बुझने न पाये, टूटने न पाये श्रृंखला बिगड़ने न पाये। बीच-बीच में हमको अधःपतन की ओर गिरने का मौका न आये, ठोकरें नहीं लगे, चोट नहीं लगें और इस प्रकार निर्धारित नियत और सुनिश्चित निशान की ओर हम बढ़ते हुए चले जायें और दीपक के तरीके से प्रकाशवान होकर प्रकाश पैदा करें, अपने भीतर प्रकाश पैदा करें और अपने बाहर भी। स्नेह से भरे हुए रहें, सद्भावनाओं से भरे हुए रहें-यही तो सब दीपक के संदेश थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
स्थान ऐसा चुनें जहाँ कम से कम खटपट रहती हो और जिसे बार-बार बदलना न पड़े। बन पड़े तो उस दिन घी का अथवा तिल के तेल का अखण्ड दीपक एक दिन के लिये जलाया जाए। 14 को प्रातः जला कर 15 को प्रातः उसे बुझ जाने दिया जाए। पुष्पों से पूजा स्थली सजाई जाए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
दायें से खींचना, बायें से निकालना व पुनः बायें से खींचना व दायें से निकालना यह उलटा सीधा चक्र प्राणायाम कर रहने से इसे “लोमविलोम” व सूर्य का ध्यान कर सूर्यचक्र को जाग्रत करने की धारणा के कारण इसे "सूर्यभेदन" प्राणायाम कहते हैं। इसके पश्चात् शाँतचित्त , स्थिर शरीर, सीधी कमर, दोनों हाथ गोदी में व आँखें बन्द कर मौन गायत्री जप कर मन ही मन शाँतिकुँज पहुँचकर गायत्री तीर्थ गुरुसत्ता एवं अखण्ड दीपक का दर्शन करने, ज्योति किरणों के स्थूल शरीर-मूलाधार चक्र में, सूक्ष्मशरीर आज्ञाचक्र में तथा कारण शरीर हृदय चक्र में संचार होने व साधक के ओजवान , तेजवान , प्रकाशवान बनने व उपलब्ध अमृत वर्षा से पुलकित होकर रस विभोर होने की परिकल्पना की जाय। पंद्रह मिनट बाद पाँच बार ओंकार का गुँजन करते हुए असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योः मा अमृतंगमय की प्रार्थना करते हुए शाँति पाठ किया जाय। तत्पश्चात् दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर मुख पर तथा हृदय , पीठ , हाथ आदि पर स्पर्श करते हुए भावना की जाय कि साधना के पूर्व जो स्थिति थी उससे अब श्रेष्ठतर है व क्रमशः आत्मबल की वृद्धि हो रही हैं
शक्ति का पुँज सविता ही आत्मशक्ति के जागरण की प्रक्रिया को अगले दिनों संपन्न करेगा। इसके उपरांत पंद्रह मिनट भावनात्मक रूप से शाँतिकुँज पहुँचकर अखण्ड दीपक का दर्शन करने ,गंगा की गोद , हिमालय की छाया व दैवी संरक्षण में पहुँचकर शक्ति स्रोत से जुड़ने तथा तीनों शरीरों में शक्ति के संचार की ओजस्-तेजस्-वर्चस की वृद्धि की तथा हिमालय की दैवी चेतन प्राण धारा से अनुप्राणित होने की ध्यान-धारणा संपन्न की जाय। पाँच मिनट प्रारंभिक उपचार , दस मिनट तीन प्राणायाम तथा पंद्रह मिनट की ध्यान-धारणा इस प्रकार आधे घण्टे का यह उपक्रम नियमित रूप से निभाया जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
” (पृष्ठ 14-22) आगे चलकर उनकी गुरुसत्ता उन्हें हिमालय बुलाती रही व समय-समय पर मार्गदर्शन देती रही। अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन, 24 वर्षों तक 24 लक्ष के गायत्री के महापुरश्चरण, अखण्ड-ज्योति पत्रिका के माध्यम से विचार क्रान्ति का, मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग की प्रक्रिया का बीजारोपण, गायत्री महाविद्या का जन-जन तक विस्तार , यज्ञीय परम्परा का दिक्-दिगन्त में प्रचलन, आर्षसाहित्य का पुनर्जीवन, जीवन जीने की कला संबंधी साहित्य लेखन, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का मार्ग दर्शन, परिव्रज्या परम्परा का पुनर्जीवन, पूर्ण समयदानी लोकसेवियों का उत्पादन हेतु एक टकसाल की स्थापना, सिद्ध तीर्थ-गायत्री तीर्थ का शिलान्यास, विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय की शोध हेतु ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया का शुभारंभ प्रज्ञा संस्थानों के रूप में संस्कार केन्द्रों की चार हजार से अधिक संख्या में भारत भर में स्थापना, विश्वभर में हिन्दू संस्कृति का तत्त्वज्ञान पहुँचाने की प्रक्रिया का शुभारंभ यह सब निर्धारण परोक्ष महाकाल की सत्ता द्वारा किये गए जो समय-समय पर परम पूज्य गुरुदेव को निर्देश रूप में दिये जाते रहे , तदनुसार ही उनके जीवनक्रम का एक-एक मील का पत्थर स्थापित होता चला गया। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारण जो धरती के स्वर्ग-ऋषियों की कार्यस्थली दुर्गम हिमालय में गुरु-शिष्य द्वारा किया गया , वह था ऋषि परम्परा का पुनरुद्धार-पुनर्जीवन

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
उन दिनों ज पके समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी; और अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है। नित्यकर्म में पंचयज्ञ, बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
अपनी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता से बाल्यकाल में साक्षात्कार उनका इसी दिन हुआ था। अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन से लेकर चौबीस महापुरश्चरणोँ का शुभारम्भ, “अखण्ड-ज्योति “ पत्रिका से लेकर गायत्री परिवार की स्थापना, आर्षग्रन्थों के भाष्य से लेकर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना तथा युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर देश भर में चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के संकल्प इसी पावन वेला में लिये गये। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व गायत्री नगर की स्थापना इसी पावन दिन हुई। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत क्राँतिधर्मी साहित्य की सृजन शृंखला इसी दिन आरंभ हुई
इस शक्ति−संचार साधना के उपक्रम में हर परिजन को ब्राह्ममुहूर्त में सूर्योदय से 1/2 घण्टे पूर्व से 1/2 घण्टे बाद तक की अवधि में कोई समय निकालकर उपासना विशेषाँक (अक्टूबर 91) में बताए गए विधि-विज्ञान द्वारा न्यूनतम 1/2 घण्टे जप की व्यवस्था बनानी चाहिए। इस अवधि में शाँतिकुँज पहुँचने, प्रखर-प्रज्ञा-सजल श्रद्धा का दर्शन कर अखण्ड दीपक का दर्शन तथा वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से तीनों शरीरों में शक्ति−संचार का ध्यान करना है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र की भी व्यवस्था बनायी जाय। गायत्री चालीसा का पारायण जितना संभव हो सके, स्वयं भी करें व दस सहयोगी परिजनों को करायें, प्रेरित करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
यहाँ प्रसंग ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का चल रहा है, जिसके प्रतिपादनों ने न केवल अगणित व्यक्तियों के मनोबल को जगाया है, उन्हें मूर्च्छना से उठाया है, उन्हें हस्तामलकवत भविष्य संबंधी मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष गुरु की भूमिका निभाई। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी जिन्होंने अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पूर्व में 1937 की वसंत पंचमी से आरंभ की, इसे प्रकाशन के रूप में 1940 की वसंत पंचमी से आरंभ की इसे दैवीचेतना का संदेश ही मानते थे। अनेकानेक व्यक्ति इस पारस के संपर्क में आकर अनगढ़ लौहखंड से स्वर्ण बनते चले गए। जीवन जीने की दिशा मिली, प्रेरक मार्गदर्शन मिला मानों कोई उँगली पकड़कर चलना सिखा रहा हो
मिशन-गायत्री परिवार का विराट तंत्र अपनी प्रौढ़ता की स्थिति में है। आगामी वर्ष हमें अखण्ड दीपक की हीरक जयंती के रूप में युगचेतना का अवतरण वर्ष मनाएंगे। 75 वर्ष का प्रौढ़ यह परिवार भारी-भरकम व्यक्तित्व वाले भावनासंपन्न प्रतिभाशालियों के समुदाय के उभरकर एकजुट होने के रूप में विकसित हो, यही महाकाल की इच्छा है। हम सब तो इसके श्रेयाधिकारी बन रहे हैं, इस सौभाग्य भरे अवसर पर सक्रिय होने-बने रहने में ही हमारी शान है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना
विराट् गायत्री परिवार का जनम हम यों तो सन् 1926 के वसंत पर्व से मानते हैं, जब अखण्ड दीपक के प्रकाश में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी गुरुसत्ता की पहली झलक देखी व मार्गदर्शन पाया था। परंतु शरीर से परमपूज्य गुरुदेव के जन्म लेने (आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विं संवत् 1968 सन् 1911) से पूर्व के वातावरण का एक विहंगावलोकन करना भी प्रासंगिक होगा। भारतभूमि इस सदी के आगमन की वेला में न केवल विदेशी आक्राँताओं के चंगुल में थी, समाज भी पिछड़ेपन के अभिशाप से ग्रस्त था
पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पर्व की वेला में सूर्योदय के पूर्व गायत्री उपासना कर रहे साधक श्रीराम के पिताजी की आँवलखेड़ा स्थित हवेली के कक्ष (जो एक स्मारक के रूप में आज विनिर्मित है) में दीपक के प्रकाश से एक ज्योति पुरुष प्रकट हुए व उन्होंने अपने शिष्य को सूक्ष्मशरीर से दीक्षा दी,विगत जन्मों की जानकारी कराई व भविष्य में क्या कुछ किया जाना है, इस संबंध में विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना
आगामी 75 वर्षों में इसे ऐतिहासिक भूमिका निभानी थी। संयोग से यह अवधि नवयुग के आगमन के साथ 2001 में अखण्ड दीपक की हीरक जयंती व सारे वर्ष को उसी रूप में मनाने के लिए निर्धारित हो पूरी होने जा रही है। कितना विलक्षण है हम सबका सौभाग्य कि हम इस पल से -इस घड़ी से गुजर सकेंगे व अपना जीवन कृतार्थ कर सकेंगे। अनेक दृष्टियों से 1926 ईसवी का यह वर्ष ऐतिहासिक वर्ष कहा जा सकता है
हर भव्य परिणति वाले घटनाक्रम की शुरुआत सदैव छोटी ही होती है। एक अखण्ड दीपक से उपजे प्रकाश ने देवसंस्कृति दिग्विजय में लगे करोड़ों सृजन -शिल्पियों के समुदाय का कैसे एकजुट कर एक विराट् गायत्री परिवार की परिधि में बाँध दिया, यह एक बड़ी मर्मस्पर्शी कथा−गाथा है। इसके मूल में परमपूज्य गुरुदेव का कठोर तप व परमवंदनीया माताजी की स्नेह संवेदना है। प्रखर प्रज्ञा व सजल श्रद्धा के इस युग्म ने ही उस पौधे को सींचा है जिसे 1926 से पालन-पोषण कर पूज्यवर अकेले 1943 तक ही यात्रा तक बढ़ाते रहे व फिर दोनों ने मिलकर उसे बड़ा किया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
किसी का भी परिग्रह करने की कभी भी कोशिश नहीं की। 1926 में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के साथ अपना महापुरश्चरण आरंभ करने से लेकर आँवलखेड़ा गाँव में पारमार्थिक गतिविधियाँ चलाने तथा फिर स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी तक वे अपने पास का सब कुछ न्यौछावर ही करते रहे। घर में सब कुछ होते हुए भी कौन चाहेगा कि वह मात्र एक लोहे का तसला लेकर निकल जाए व अपने परिवारजनों की यह व्यंग्योक्ति सुनकर कि अब जब राज्य तुम्हारा तुम्हें वापस मिल जाए (अर्थात् आजादी मिल जाए) तो हाथी पर बैठकर आना, तुम्हारा तिलक करेंगे, वह फिर कभी लौटकर भी न जाए। जेल में चक्की पीसे, कैदियों को पढ़ाए-स्वयं अंग्रेजी सीखे एवं फिर काँग्रेस (तत्कालीन) का एक विनम्र स्वयंसेवक बनकर श्री कृष्ण दत्त जी पालीवाल के एक सहयोगी तथा श्री केसकर (तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री) के निजी सहायक के रूप में कार्य किए
अगला वर्ष युगचेतना के भरती पर अवतरण के 75 वें वर्ष की रजतजयंती के रूप में मनाया जाने वाला है। सभी जानते हैं कि ‘अखण्ड दीपक’ के रूप में युगचेतना नए युग का संदेशा लेकर धरती पर 1923 की वसंत पंचमी 18 जनवरी की ब्रह्ममुहूर्त की पावन वेला में आई। साथ ही परमवंदनीय माताजी भी धरती पर इसी वर्ष आश्विन कृष्ण चतुर्थी के पावन दिन अवतरित हुई। इस वर्ष को तीसरा सौभाग्य मिला श्री अरविंद के द्वारा भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित करने के रूप में

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
अगला वर्ष युगचेतना के भरती पर अवतरण के 75 वें वर्ष की रजतजयंती के रूप में मनाया जाने वाला है। सभी जानते हैं कि ‘अखण्ड दीपक’ के रूप में युगचेतना नए युग का संदेशा लेकर धरती पर 1923 की वसंत पंचमी 18 जनवरी की ब्रह्ममुहूर्त की पावन वेला में आई। साथ ही परमवंदनीय माताजी भी धरती पर इसी वर्ष आश्विन कृष्ण चतुर्थी के पावन दिन अवतरित हुई। इस वर्ष को तीसरा सौभाग्य मिला श्री अरविंद के द्वारा भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित करने के रूप में

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
सभी कलश यहीं रख लिए जाएँगे। अखण्ड दीपक की साक्षी में रखे राष्ट्र भर में घूमकर आए, इन कलशों को विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ (नई दिल्ली-13 अक्टूबर 2000 जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम) में तथा 6 से 11 नवंबर 2000 को शाँतिकुँज केंद्र में होने वाले 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के महापूर्णाहुति वर्ष के सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में मंच पर राष्ट्रीय एकता सद्भाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाएगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
इसे आजीवन चाल रखा जाएगा। अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का ही स्वरूप हैं। धूपबत्तियों को जलाने, हवन सामग्री की, अखण्ड जप-मंत्रोच्चारण की दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हैं-ऐसा हमें लगा। इस तरह अखण्ड हवन की स्वसंचित प्रक्रिया बन जाती हैं
अखण्ड दीपक युगपरिवर्तन के इतिहास का, नई सहस्राब्दी के परिवर्तन वेला के आगमन का एवं नवयुग-सतयुग के शुभारंभ का साक्षी हैं। महापूर्णाहुति वर्ष की इस वेला में यह विशेषाँक इस अखण्ड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के साथ उस गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित हैं, जो श्रद्धा एवं प्रज्ञा का समन्वित रूप हैं, जिसने युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि विनिर्मित कर श्रेय लूटने के लिए हम सभी को निमित्त बना दिया है। उस पावन प्रज्ञापुरुष को शत-शत नमन हैं
इसे आजीवन चाल रखा जाएगा। अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का ही स्वरूप हैं। धूपबत्तियों को जलाने, हवन सामग्री की, अखण्ड जप-मंत्रोच्चारण की दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हैं-ऐसा हमें लगा। इस तरह अखण्ड हवन की स्वसंचित प्रक्रिया बन जाती हैं
क्रमशः चार संक्राँति पर्वों के चार अध्यायों के माध्यम से ही सब यह समझ पाएंगे कि विश्व के भारतीय संस्कृति से ओत−प्रोत होने की वेला किन विषम परिस्थितियों से यात्रा करके अब आई हैं। परिवर्तन का चक्र यों तो विगत दो सौ वर्षों से सतत् चाल आ रहा हैं, किन्तु एक अखण्ड दीपक ने निरंतर जलकर मानो उस परिवर्तन−प्रक्रिया का पटाक्षेप ही कर डाला एवं हम सभी को नए युग की अगवानी हेतु ला खड़ा किया हैं। जिस प्रज्ञापुरुष एवं जगज्जननी की शक्ति उस दीपक को जलाए रखने-प्रखरता के शिखर तक पहुँचाने में लगी, उसने सतत् एक कार्य किया। विचारों को ऊँचा उठाए रखना-क्षुद्रता की कीचड़ में कुलबुला रहे कीड़ों को ऊपर उठकर अपना जीवन उबारने की, नरपशु से देवमानव-महामानव बनने की, व्यक्तित्व के कायाकल्प की प्रेरणा देने का कार्य उस महाशक्ति ने ही किया
राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की भारतव्यापी शृंखला के बाद दीपयज्ञों के विराट् आन्दोलनों की घोषणा, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण के शुभारंभ के साथ ही बाहर वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की विधिवत् शुरुआत तथा महाकाल के वासंती संदेश के साथ अपनी स्थूल काया को निर्धारित अवधि में महाप्रयाण द्वारा सूक्ष्म में विलीन करने की घोषणा भी इसी अखण्ड दीपक की साक्षी में हुई हैं। अखण्ड दीपक युगपरिवर्तन के इतिहास का, नई सहस्राब्दी के परिवर्तन वेला के आगमन का एवं नवयुग-सतयुग के शुभारंभ का साक्षी हैं। महापूर्णाहुति वर्ष की इस वेला में यह विशेषाँक इस अखण्ड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के साथ उस गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित हैं, जो श्रद्धा एवं प्रज्ञा का समन्वित रूप हैं, जिसने युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि विनिर्मित कर श्रेय लूटने के लिए हम सभी को निमित्त बना दिया है। उस पावन प्रज्ञापुरुष को शत-शत नमन हैं
यह महासंक्राँति पर्व आया ही ऐसी वेला में हैं, जब अरुणोदय निकट हैं, नवयुग का सूर्य उदय होने ही वाला हैं, ऊषाकाल के प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्योदय की घड़ियाँ बस अंतिम स्थिति में गिनी ही जा रही हैं। ऐसे में जब हम नई ईस्वी-संवत्सर की इक्कीसवीं सदी के मध्यकाल को पारकर हम सं. 2057-2058 में प्रवेश कर रहे हैं, इस महासंक्राँति के महानायक आचार्य श्रीराम शर्मा जी के पुरुषार्थ को ही स्मरण नहीं कर रहे, उनके द्वारा घोषित सतयुग की अगवानी भी प्रस्तुत महापूर्णाहुति वर्ष आगामी हीरक जयंती (अखण्ड दीपक) वर्ष के माध्यम से करने जा रहे हैं। कौन होंगे हम से अधिक सौभाग्यशाली, जो इन क्षणों के साक्षी बनेंगे?
‘अखण्ड ज्योति’ नाम इसी पर रखा गया। यही अखण्ड दीपक अब आगे माता जी सुरक्षित रखेंगी। हम 20 जून को मथुरा छोड़ देंगे। माता जी भी साथ ही भी साथ ही पड़े पड़ेंगी
परमवंदनीया माता जी भी इसे सँवारने,प्रखर बनाने, रक्षा करने हेतु तत्पर हो 1943 में मथुरा पूज्यवर के साथ आ जुटी। इसी अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन (1923) वाले वर्ष में उनका शरीर से जन्म भी तो निमित्त हुआ था। प्रखरता व सजलता ने प्रामाणिकता को खोजा-तराशा व एक विराट् गायत्री परिवार बना दिया। 1953 का शतकुँडी नरमेध यज्ञ तथा गायत्री तपोभूमि की स्थापना का कार्य इसी दीपक की उपस्थिति में संपन्न हुआ
राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की भारतव्यापी शृंखला के बाद दीपयज्ञों के विराट् आन्दोलनों की घोषणा, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण के शुभारंभ के साथ ही बाहर वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की विधिवत् शुरुआत तथा महाकाल के वासंती संदेश के साथ अपनी स्थूल काया को निर्धारित अवधि में महाप्रयाण द्वारा सूक्ष्म में विलीन करने की घोषणा भी इसी अखण्ड दीपक की साक्षी में हुई हैं। अखण्ड दीपक युगपरिवर्तन के इतिहास का, नई सहस्राब्दी के परिवर्तन वेला के आगमन का एवं नवयुग-सतयुग के शुभारंभ का साक्षी हैं। महापूर्णाहुति वर्ष की इस वेला में यह विशेषाँक इस अखण्ड दीपक के 75वें वर्ष में प्रवेश के साथ उस गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित हैं, जो श्रद्धा एवं प्रज्ञा का समन्वित रूप हैं, जिसने युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि विनिर्मित कर श्रेय लूटने के लिए हम सभी को निमित्त बना दिया है
इसने संगठन के आधार को खड़ा कर दिया। इसी अखण्ड दीपक ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को 1937 से आरंभ होकर ज्ञानयज्ञ का प्रकाश लाखों लोगों तक पहुँचाते देखा हैं। गायत्री महाविज्ञान की रचना, आर्षग्रंथों का भाष्य एवं युगनिर्माण योजना के सूत्रपात का उद्घोष इस अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन की वासंती वेला में ही हुआ हैं। महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया से लेकर मथुरा से विदाई की घोषणा, हिमालय यात्रा के बाद ऋषि परंपराओं की स्थापना का संकल्प, शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ के रूप में एक कल्पवृक्ष के निर्माण से लेकर इसकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में चौबीस सौ शक्तिपीठों के निर्माण के संकल्प भी इसी दीप प्रज्ज्वलन के दिन वसंत पंचमी की उल्लास के समन्वय को संकल्पित ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना से लेकर बीस वर्षीय युगसंधि के विशिष्ट साधना अभियान की शुरुआत एवं प्रज्ञापुराण रूपों अद्वितीय 19वाँ पुराण भी इसी वेला में लिखा गया
सन् 1926 के वसंत पूर्व प्रज्वलित अखण्ड घृतदीप वसंत पंचमी 2000 पर अपने पिचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहा हैं। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का साक्षी यह अखण्ड दीपक हमारे आराध्य के आध्यात्मिक जन्मदिवस का ही नहीं, बोध दिवस का ही नहीं, इस विराट् गायत्री परिवार की विकासयात्रा का भी द्योतक हैं। जीवन में सद्भावना का प्रकाश प्रज्वलित किए रहने से कैसे क्राँतिकारी तूफान उठ खड़े होते हैं, सहस्राब्दी की पूर्ण वेला में आया सन् 2000 हम सबको उस तप-त्याग-प्रखरता की याद लाता है, जिससे इसके अंतिम कुछ दशक संक्राँति की वेला में एक अभिनव स्थापना कर गए। विचारक्राँति अभियान दीपक के प्रकाश में ही वेग पकड़ता चला गया
भारतवर्ष के बेकलभावन ताजमहल के लौकिक सौंदर्य के पास ही यह अलौकिक एवं आध्यात्मिक सौंदर्य प्रदीप्त हुआ। आगरा जिले के आंवलखेड़ा गाँव की एक छोटी-सी कोठरी में जलाए गए एक अखण्ड दीपक के माध्यम से हिमालय की ऋषिसत्ता ने सूक्ष्मशरीर से आकर एक नवीन शुभारंभ किया। सन् 1911 ई (वि.सं.1968) में जन्मे 15 वर्षीय किशोर श्रीराम शर्मा के साधक जीवन का श्रीगणेश हुआ। उनके चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस गायत्री महामंत्र के पुरश्चरणों की यात्रा इसी दिन प्रारंभ हुई
इसी अखण्ड दीपक ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को 1937 से आरंभ होकर ज्ञानयज्ञ का प्रकाश लाखों लोगों तक पहुँचाते देखा हैं। गायत्री महाविज्ञान की रचना, आर्षग्रंथों का भाष्य एवं युगनिर्माण योजना के सूत्रपात का उद्घोष इस अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन की वासंती वेला में ही हुआ हैं। महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया से लेकर मथुरा से विदाई की घोषणा, हिमालय यात्रा के बाद ऋषि परंपराओं की स्थापना का संकल्प, शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ के रूप में एक कल्पवृक्ष के निर्माण से लेकर इसकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में चौबीस सौ शक्तिपीठों के निर्माण के संकल्प भी इसी दीप प्रज्ज्वलन के दिन वसंत पंचमी की उल्लास के समन्वय को संकल्पित ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना से लेकर बीस वर्षीय युगसंधि के विशिष्ट साधना अभियान की शुरुआत एवं प्रज्ञापुराण रूपों अद्वितीय 19वाँ पुराण भी इसी वेला में लिखा गया। (शेष पृष्ठ 6 पर)
यह अखण्ड दीपक पहले आँवलखेड़ा (आगरा) में जला, फिर अखण्ड ज्योति-संस्थान, घीयामंडी, मथुरा में एवं अब यह शाँतिकुँज हरिद्वार में विगत 29 वर्षों से सतत् प्रज्ज्वलित हैं। 24 लक्ष के 24 महापुरुष इसकी ही साक्षी में संपन्न हुए। परमवंदनीया माता जी भी इसे सँवारने,प्रखर बनाने, रक्षा करने हेतु तत्पर हो 1943 में मथुरा पूज्यवर के साथ आ जुटी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
आशक्ति व पूर्ण समय दे सकने वाले अनेक लोकसेवी राष्ट्र-स्तर की स्थापना ही इस लक्ष्य के साथ की जा रही है कि आने वाले दिनों में केंद्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर इसका एक अंग बनकर वे कार्य करने हेतु संकल्पित हों। यदि अश्वमेध संस्कार महोत्सव इस सौत्रामणी प्रयोग के समान थे, तो अनुयाज रूप में प्रतिभा परिष्कार की सत्र शृंखला चलेगी, जो अनुयाज रूप में 2001 के अखण्ड दीपक एवं युगचेतना के अवतरण के हीरक जयंती वर्ष में सम्पन्न होगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
विस्तार से जानने के लिए 1 अप्रैल का पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ सभी पढ़ लें। जैसाकि बताया गया था 19 जून को अंतिम आयोजन के बाद सभी यात्राएँ जन्मभूमि आंवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा होती हुई शांतिकुंज हरिद्वार 16 जून ज्येष्ठ पूर्णिमा की पहुँचेगी व अपने-अपने कलश अखण्ड दीपक की साक्षी में स्थापित करेंगी। इस समय गुजरात में पाँच, म0प्र0 में दो, राजस्थान में एक हरियाणा, हिमाचल, जम्मू, पंजाब में एक उड़ीसा बंगाल में एक उत्तरप्रदेश में दो महाराष्ट्र में एक तथा दक्षिण भारत में एक इस प्रकार कुल 14 यात्राएँ विभिन्न जोन में होती हुई निकल रही हैं। सघन मंथन भी चल रहा है एवं गायत्री परिवार के विषय में जनचेतना तेजी से जाग रही है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
अखण्ड दीपक की, ज्योति जागी,बना दिया है, प्रभात बागी,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
अब से लगभग 40 वर्ष पर्व हमारे सामान्य जीवन में एक दिव्य प्रेरणा इसी दिन अवतरित हुई। गुरुदेव ने इसी दिन दर्शन दिये, जीवन-दर्शन की दिशा मोड़ी, 24 गायत्री महापुरश्चरणों की तपश्चर्या का आरम्भ कराया, अखण्ड दीपक की स्थापना हुई। इस आरम्भ का उद्देश्य नवनिर्माण के उपयुक्त क्षमता उपार्जित करने की तैयारी मात्र था। किसी व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए नहीं नवनिर्माण के पूर्ण भूमिका के रूप में ही

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी के प्रचण्ड तप की प्रभा आज भी इसके कण-कण में विद्यमान है, जिसे कोई भी नैष्ठिक साधक अनुभव कर सकता है। इसका चिरसाक्षी 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक आज भी अपनी दिव्य आभा बिखेर रहा है। इसके सान्निध्य में अब तक करोड़ों की संख्या में गायत्री महामंत्र का जप हो चुका है। यहाँ निवास कर रहे व बाहर से आने वाले हजारों साधकों द्वारा नित्य लक्षाधिक जप चलता रहता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
हम सभी इस वर्ष प्रखर प्रज्ञारूपी सतत प्रज्वलित अखण्ड अग्नि के रूप में पहले अखण्ड ज्योति संस्थान एवं फिर शाँतिकुँज हरिद्वार में स्थापित’ अखण्ड दीपक के 85 वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती की विशिष्ट साधना का क्रम बना रहे हैं। साधना आँदोलन को गति दे रहे हैं एवं प्रत्येक को इस अभियान से जुड़कर परिष्कृत व्यक्तित्वसंपन्न इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी सँभालने योग्य महामानव बनने का आमंत्रण दे रहे हैं। सभी क्रियाप्रधान कार्यक्रम इसी साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे
सभी जानते है। सभी जानते हैं कि अखण्ड दीपक के प्रज्वलन तथा अपनी गुरुसत्ता से वसंत पर्व 1926 की पावन वेला में हुए साक्षात्कार से साधना प्रधान इस गायत्री पर्व का शुभारंभ माना जाता है। यह एक महान् पुरुषार्थ है, जो करोड़ों साधकों ने अपनी आराध्य सत्ता के पदचिह्नों पर चलकर पूरा किया है। जनवरी 1986 में जब परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ण जयंती वर्ष की विशेष साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
‘अखण्ड ज्योति’ एक पत्रिका नहीं, प्रेरणा पुँज हैं, प्राणचेतना की संवाहिका है। ‘अखण्ड दीपक’ जो 1926 से प्रज्वलित होकर 1972 में शाँतिकुँज आने के बाद से सतत प्रज्वलित है, अपनी हीरक जयंती इस वर्ष मना रहा है तथा परमपूज्य गुरुदेव के प्रखर तप का प्रतीक है। इसी ‘अखण्ड दीपक’, के, जो अब अखण्ड अग्नि, अखण्ड यज्ञ का स्वरूप ले चुका है, दिव्य प्रभामंडल में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का 1938 की वसंत पंचमी को शुभारंभ हुआ। हाथ से बने कागज पर हाथ से चलने वाली मशीन की मदद से इसकी छपाई मात्र दो सौ पत्रिका से आरंभ यह पत्रिका कुछ समय के लिए बंद हो गई
‘अखण्ड दीपक’ जो 1926 से प्रज्वलित होकर 1972 में शाँतिकुँज आने के बाद से सतत प्रज्वलित है, अपनी हीरक जयंती इस वर्ष मना रहा है तथा परमपूज्य गुरुदेव के प्रखर तप का प्रतीक है। इसी ‘अखण्ड दीपक’, के, जो अब अखण्ड अग्नि, अखण्ड यज्ञ का स्वरूप ले चुका है, दिव्य प्रभामंडल में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का 1938 की वसंत पंचमी को शुभारंभ हुआ। हाथ से बने कागज पर हाथ से चलने वाली मशीन की मदद से इसकी छपाई मात्र दो सौ पत्रिका से आरंभ यह पत्रिका कुछ समय के लिए बंद हो गई। पुनः पूरी तैयारी के साथ फ्रीगंज आगरा से वसंत पर्व 1940 से इसका प्रकाशन आरंभ हुआ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
दो विशिष्ट सुयोग और इस 2001 वें वर्ष के साथ जुड़े हैं। एक अखण्ड दीपक के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा स्नेहसलिला परमवंदनीया माताजी की जीवनयात्रा के 75 वर्ष भी पूरे होना। 1926 में ही आश्विन कृष्ण चतुर्थी की पावन वेला में आगरा नगर में श्री जसवंत बोहरे जी के परिवार में माता भगवती देवी ने जन्म लिया था। दूसरा सुयोग है श्री अरविंद (पाँडिचेरी) ने इसी वर्ष भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था, आज से 75 वर्ष पूर्व
इस कलश यात्रा में पहली बार पूज्यवर द्वारा प्रज्वलित, परमवंदनीया माताजी द्वारा संरक्षित अखण्ड दीपक भी यात्रा की अगवानी करता साथ चला। लोककला मंच के कलाकार भी कलश यात्रा में अपने क्षेत्र की संस्कृति का दिग्दर्शन कराते साथ चल रहे थे। स्थान-स्थान पर नगरवासी जल-शरबत, मूँगफली, मिश्री, फलों के थाल लिए खड़े थे एवं देवसत्ताओं के प्रतीक रूपी कलशयात्रियों को देते चले जा रहे थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
वसंत पर्व से आरंभ हुआ यह हीरक जयंती वर्ष कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक, जो अब शाँतिकुँज में स्थित है, के 75वें, वर्ष में प्रवेश वाला वर्ष है। इसी की साक्षी में परमपूज्य गुरुदेव व शक्तिस्वरूपा माताजी के सभी महत्त्वपूर्ण निर्धारण हुए, जिनने इस मिशनरूपी वटवृक्ष को इस समुन्नत स्थिति में पहुँचाया है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे एक अखण्ड अग्रि−अखण्ड यज्ञ की संज्ञा दी थी
(1) इसी उद्देश्य से परिजनों के लिए इस वर्ष विशिष्ट साधना सत्रों की श्रृंखला का निर्धारण किया गया है। हमारे 75 वर्ष के परिपक्व वयोवृद्ध इस संगठन के प्राणवान् वरिष्ठ कहे जाने वाले प्रज्ञापुत्रों से यह अनुरोध किया जा रहा है कि अब इस वर्ष वे अखण्ड दीपक के सान्निध्य में एक अनुष्ठान से युक्त विशिष्ट सत्र प्रतिवर्ष करते रहने का क्रम बना लें। ये प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के एकान्त साधना सत्र होंगे। इनमें साधक को एक ही कोठरी में 24 घंटे रहना होगा, मौत सहित तप के सारे उपक्रम पूरे करने होंगे, मात्र गुरुदेव को ही सुनना व पढ़ना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
प्रस्तुत वर्ष 21 का वर्ष हीरक जयंती वर्ष है। 1926 से जलते आ रहे इस अखण्ड दीपक ही हीरक जयंती जिसके प्रकाश में गायत्री परिवार जन्मा, एक बीज से वटवृक्ष बना एवं आज चारों ओर छाए घने कुहासे के बीच सभी के लिए एक आशा की किरण की तरह है। यह वर्ष हमारे 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण का अनुयाज वर्ष भी है। अनुयाज कहते हैं किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के ‘फालोआप’ को

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
साथ ही सीमित अवधि में वही तप संपन्न करना था, जो गुरुसत्ता ने पंद्रह वर्ष की आयु में आरंभ कर चौबीस वर्ष में पूरा किया था। अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए अखण्ड दीपक की साक्षी में पहले दस, फिर सोलह, फिर चौबीस कन्याओं का अखण्ड जप चला। उनका प्रशिक्षण भी माताजी ने सँभाला। यहीं से गायत्री परिवार के महिला जागृति आँदोलन ने जड़ें मजबूत कीं
युगचेतना के अवतरण को 75 वर्ष पूरे हुए। एक छोटा-सा साधारण-सा दीपक अचानक 18 जनवरी 1926 की ब्रह्ममुहूर्त की वेला में एक पंद्रह वर्षीय बालक के लिए अखण्ड दीपक बन गया। उसी दीपक की लौ में से उसके गुरु प्रकट हुए थे एवं उनने उसे बालक श्रीराम को बोध कराया था कि उसका अवतरण किसलिए हुआ है। सूक्ष्मशरीरधारी परोक्षजगत से पधारी गुरुसत्ता ने उस दिन, उस बोध दिवस के दिन अनायास ही गायत्री परिवार नामक एक संगठन को जन्म दे दिया, जो कि इस वर्ष अपने 75 वर्ष पूरे कर रहा है निरंतर जल रही अखण्ड अग्नि, अखण्ड दीपक की लौ-आभा के साथ
उसी दीपक की लौ में से उसके गुरु प्रकट हुए थे एवं उनने उसे बालक श्रीराम को बोध कराया था कि उसका अवतरण किसलिए हुआ है। सूक्ष्मशरीरधारी परोक्षजगत से पधारी गुरुसत्ता ने उस दिन, उस बोध दिवस के दिन अनायास ही गायत्री परिवार नामक एक संगठन को जन्म दे दिया, जो कि इस वर्ष अपने 75 वर्ष पूरे कर रहा है निरंतर जल रही अखण्ड अग्नि, अखण्ड दीपक की लौ-आभा के साथ
भूल गईं आगरा-मथुरा, वहाँ से जुड़ी ममता। अब उनसे जुड़ गईं कुमारी कन्याएँ, जिनके साथ उन्हें अखण्ड दीपक की रक्षा करनी थी। साथ ही सीमित अवधि में वही तप संपन्न करना था, जो गुरुसत्ता ने पंद्रह वर्ष की आयु में आरंभ कर चौबीस वर्ष में पूरा किया था। अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए अखण्ड दीपक की साक्षी में पहले दस, फिर सोलह, फिर चौबीस कन्याओं का अखण्ड जप चला
यह हीरक जयंती परमवंदनीया माताजी की भी है, अखण्ड दीपक की भी, जिसकी साक्षी में करोड़ों का जप संपन्न हो चुका है। परमवंदनीया माताजी ने ही 1972-73 में नारी जागृति आँदोलन की बागडोर अपने हाथ में ली थी, जिसकी परिणति देवकन्याओं की क्षेत्रीय परिब्रजा में हुई। अब इस ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला शक्ति जागरण वर्ष’ में, हीरक जयंती वर्ष में हमारे सात में से एक आँदोलन महिला जागरण को विशेष रूप से हाथ में लिया जा रहा है
संवेदना की मूर्ति नारी को उसकी वर्षों की घुटन से मुक्ति मिले, वह स्वावलंबी, शिक्षित, सुसंस्कारी हो पुरुष के साथ कंधे-से-कंधे मिलाकर आगे बढ़ सके। धर्मतंत्र के माध्यम से साँस्कृतिक नवोन्मेष की प्रक्रिया को मूर्त रूप दे सके, इसीलिए इस वर्ष को विशेष रूप से परमवंदनीया माताजी के जन्म के साथ युगचेतना के अवतरण, अखण्ड दीपक के प्रज्वलन की हीरक जयंती के रूप में उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दहेज की समस्या से, जलती बहू-बेटियों के हाहाकार से, परोक्ष जगत् के विक्षुब्ध होने की प्रक्रिया से, अपव्यय-फैशनपरस्ती, अश्लील प्रदर्शन से घिरी विडंबना से नारी ही मुक्ति दिला सकेगी। आइए हम सभी इस आँदोलन रूपी महायज्ञ में एक समिधा बन स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
अखण्ड दीपक की, ज्योति जागी, बना दिया है, प्रभात बागी, न काम देगा त्रुमार कोई नया उजेला, पुकारता है
’ (अखण्ड ज्योति मई 1961, पृष्ठ 61) उपर्युक्त प्रसंग उस अखण्ड दीपक के विषय में हैं, जो आँवलखेड़ा, आगरा एवं मथुरा के बाद अब शाँतिकुँज हरिद्वार में सतत प्रज्वलित है एवं जिसकी साक्षी में हमारी गुरुसत्ता द्वारा उस प्राणचेतना का आह्वान किया गया, जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलती है। वस्तुतः अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ही 1937-38 में पूज्यवर ने यह विलक्षण नाम इस पत्रिका को दिया था
अतएव वह केवल अखण्ड दीप मात्र ही नहीं रहता वरन् अखण्ड यज्ञ बन जाता है, वहाँ अनायास ही हमें अपनी मनोभूमि उच्चस्तरीय रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण लाभ लेने में सुविधा मिलती है। ’ (अखण्ड ज्योति मई 1961, पृष्ठ 61) उपर्युक्त प्रसंग उस अखण्ड दीपक के विषय में हैं, जो आँवलखेड़ा, आगरा एवं मथुरा के बाद अब शाँतिकुँज हरिद्वार में सतत प्रज्वलित है एवं जिसकी साक्षी में हमारी गुरुसत्ता द्वारा उस प्राणचेतना का आह्वान किया गया, जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलती है। वस्तुतः अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ही 1937-38 में पूज्यवर ने यह विलक्षण नाम इस पत्रिका को दिया था
नवनिर्मित त्रिपदा-2 (पातंजलि भवन) में स्थान प्रायः साठ शिविरार्थियों के लिए सुरक्षित रखे गए हैं। चौबीस घंटे में मात्र एक बार साधकगण एक साथ कल्क सेवन कर अखण्ड दीपक को प्रणाम करने तथा उनके लिए सुरक्षित यज्ञशाला में यज्ञ संपन्न करने हेतु निकलते हैं। सभी इन साधना सत्रों का पूरा लाभ उठा रहे हैं एवं सत्र पूरा होने पर हो रहे समीक्षा गोष्ठियों में अपने सुखद अनुभवों अनुभूतियों की चर्चा भी कर रहें हैं। यह क्रम 10 अप्रैल नवरात्रि तक चलता रहेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
साधना प्रारंभ होने से समापन तक साधकों को मौन, एकाँत सेवन करते हुए अंतर्मुखी रहना होगा। मात्र अखण्ड दीपक−दर्शन एवं यज्ञ के समय वे कक्ष के बाहर निकल सकेंगे। साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
मणिनगर (अहमदाबाद) में चैत्र की नवरात्रि आयोजन के लिए उत्साहपूर्वक तैयारियाँ हो रही हैं। अखण्ड कीर्तन, अखण्ड दीपक, रामायण के नौ परायण, यज्ञ, प्रवचन आदि का कार्यक्रम बनाया गया है। -मिश्रीलाल कन्हैयालाल जोशी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
एक दिन मैं मंदिर में बैठकर जप कर रहा था कि अचानक ही माता द्वारा प्रेरणा हुई कि अब से एक माह के उपराँत श्रावण आ रहा है। इस समय मंदिर में उपासक तथा अन्य व्यक्ति भी एकत्रित होंगे उनसे अखण्ड दीपक के लिए एक-एक रुपया एकत्रित कर लिया जावे। प्रथम दिन केवल तीस रुपया ही एकत्र हुए। इसके पश्चात क्रमशः कुल योग 278 रुपया तक पहुँच गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
वहाँ से हमें वह अपने पूजा के कमरे में ले गये। एक छोटा सा कमरा एक ओर गायत्री जी का बड़ा चित्र रखा, अखण्ड दीपक उसके सामने जल रहा है। दूसरी ओर एक गद्दा उस पर साफ चादर थी। सब मिलकर एक सौम्य और सात्विक वातावरण उत्पन्न कर रहे थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
साठ वर्ष से जल रहा अखण्ड दीपक, नौ कुण्ड की यज्ञशाला में नित्य दो घण्टे यज्ञ, दोनों नवरात्रियों में 24-24 लक्ष के गायत्री महापुरश्चरण, साधना आरण्यक में नित्य गायत्री उपासकों द्वारा नियमित अनुष्ठान, इन सब बातों से ऐसा दिव्य वातावरण यहाँ विनिर्मित होता है जैसा मलयागिरि में चन्दन वृक्षों की मनभावन सुगन्ध का। बिना साधना किये भी यहाँ वैसा ही आनन्द आता है मानो यह समय तप साधना में बीता। शान्तिकुंज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत् दिव्य अनुभूति होने की है
अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है। इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाऐं उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड-ज्योति की प्रकाश किरणें अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
उत्तर:- निश्चित ही ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी (1911-1990) तथा परमवंदनीय माताजी (1926-1994) की विचार चेतना के प्रवाह के मार्गदर्शन में ही लिखी जाती हैं ‘अखण्ड दीपक’ जो शांतिकुंज हरिद्वार में मथुरा से 1971 में आने के बाद से ही प्रज्वलित है, इसकी एवं मिशन की सभी योजनाओं का प्रेरणा स्त्रोत हैं परमपूज्य गुरुदेव ने 1926 में जो अखण्ड दीपक प्रज्वलित किया था वही 1940 से प्रकाशित पत्रिका के ऊर्जा प्रवाह का प्रधान स्त्रोत है एवं आगामी बीस वर्षों में जो भी कुछ लिखा जाना है, उसकी मोटी रूपरेखा पूज्यवर ने महाप्रयाण से पूर्व जनवरी 1990 में बड़े स्पष्ट रूप में लिखकर दे दी थी। उँगलियाँ कोई भी लिखती हो, संपादन कोई भी करता हो, धुरी वही है मानव में देवत्व लाने के लिए-धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए श्रेष्ठ विचारों का ऐसा कल्पतरु विनिर्मित हो, जो चारों ओर ऐसा वातावरण बनाने की प्रक्रिया संपादित करें विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से लेकर सामान्य व गूढ़तम साधना पद्धतियों के मूल में भी पूज्यवर द्वारा 50 वर्ष की अवधि में लिखा गया वह चिन्तन प्रवाह है, जो समय-समय पर परिजनों तक पहुँचता रहा है वह सदैव सामयिक रहा है, रहेगा। संपादन मण्डल द्वारा जी सामयिक संदर्भ दिये जाते हैं वे भी उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अंतर्गत ही लिखे जाते हैं, एक मिलीमीटर भी इधर-उधर नहीं हटकर विगत की व सबकी पत्रिका के प्रवाह में देखकर यह अन्तर नहीं बता सकता कि यह गुरुसत्ता की लेखनी से लिखे गए हैं या नहीं
यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में। मथुरा में यह कक्ष वैसा ही बनाए रखा गया है एवं घीयामंडी में सभी उसके दर्शन कर सकते हैं। 1971 की 20 जून से यह अखण्ड दीपक परमवंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी उपस्थिति में व बाद में उनके परीक्षा संरक्षण में सतत् शांतिकुंज सप्तसरोवर हरिद्वार में जल रहा है, जहां नित्य नियमित रूप से इसको दर्शन प्रणाम करने हेतु हजारों व्यक्ति आते हैं
मथुरा में यह कक्ष वैसा ही बनाए रखा गया है एवं घीयामंडी में सभी उसके दर्शन कर सकते हैं। 1971 की 20 जून से यह अखण्ड दीपक परमवंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी उपस्थिति में व बाद में उनके परीक्षा संरक्षण में सतत् शांतिकुंज सप्तसरोवर हरिद्वार में जल रहा है, जहां नित्य नियमित रूप से इसको दर्शन प्रणाम करने हेतु हजारों व्यक्ति आते हैं। जिस दिन से यह मथुरा से हरिद्वार लाया गया है, उसी कक्ष में सतत् प्रज्वलित है। इसी के प्रकाश-मार्गदर्शन में सभी निर्णय इस दैवी मिशन के लिए जाते हैं
उत्तर:- 1926 से ‘अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड दीपक परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रज्वलित किया गया था, जिसके माध्यम से वसंत पर्व रूपी उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस की बेला में उन्हें उनकी परोक्ष मार्गदर्शन सत्ता ने हिमालय से आकर दर्शन दिए थे एवं साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन दिया था। यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में
इसी के प्रकाश-मार्गदर्शन में सभी निर्णय इस दैवी मिशन के लिए जाते हैं। यह हुई ‘अखण्ड दीपक’ की बात ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका इसी तप-साधना के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्रथम बार 1937 की वसंत पंचमी से हस्तनिर्मित कागज पर हाथ से चलने वाली मशीनों से निकलने के प्यास द्वारा आरम्भ की गयी थी। 1 अंक निकलने के बाद से अनौपचारिक रूपों से पत्रों द्वारा 200 पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास आगरा से चलता रहा है बाद में फ्रीगंज आगरा से नियमित प्रकाशन वसंतपर्व 1940 के प्रथम अंक से हुआ तो 20 जनवरी को प्रकाशित हुआ। यही प्रामाणिक रूप में उपलब्ध प्रथम अंक है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
माताजी की व्यक्तिगत साधना इसके अतिरिक्त थी जो प्रातःकाल तीन बजे से आरंभ हो जाती थी। प्रातः उठकर वे अखण्ड दीपक के सामने भजन कर रही बालिका को देखकर आती, अपना दैनंदिन कार्य समाप्त कर स्वयं भी जप में बैठ जाती थी। आरती होने तक सब बच्चों को नहला-धुलाकर तैयार करके वे उन्हें धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनने का प्रशिक्षण दे रही थी। बीच-बीच में मनोरंजन हेतु कुछ ऐसी मनोरंजक अंताक्षरियों, खेल-चर्चाओं अथवा बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों का समावेश उनका मन बहलाने के लिए करती
प्रारम्भ में उनके साथ शाँतिकुँज में मात्र तीन कार्यकर्त्ता, दो देख−रेख करने वाली महिलाएँ (शारदा देवी एवं रुकमणी देवी ) कुल चार कन्याएँ एवं एक समर्पित स्वयं सेवक के रूप में श्री रामचंद्रसिंह भी थे जो आज भी उन दिनों की साक्षी देते हैं। इन छोटी-छोटी बालिकाओं के द्वारा वं. माताजी ने न केवल अखण्ड दीपक के समक्ष 24 लक्ष के 24 अनुष्ठान कराये थे बल्कि उन्हें माँ का प्यार देते हुए उन्हें नारी जाग्रति अभियान का सूत्रधार भी बनाया था। बड़ा ही कठिन रहा होगा उस विराट हृदय वाली माँ के लिए वह क्षण, जब उनके समक्ष नन्ही-नन्ही 12 से 14 वर्ष की बालिकाएँ समस्त प्रतिकूलता के मध्य रहती हुई निरंतर तप में संलग्न रहती थी। वे स्वयं अपने भरे-पूरे परिवार को अपने पीछे छोड़कर गई थी
बदलाव तो बाद में आया है जब यहाँ गंगा पर बाँध बँध गए नहर निकालीं गईं एवं वृक्ष कटने का सिलसिला चल पड़ा। निश्चित ही नैसर्गिक सौंदर्य से भरे पड़े वातावरण के रूप में शाँतिकुँज का वह मुख्य भवन जिसमें अखण्ड दीपक स्थापित है तथा पीछे का छोटा बगीचा शामिल था। शेष विस्तार जिसे आज लोग गायत्री नगर एवं गायत्री तीर्थ के रूप में जानते हैं तो बहुत बाद में 1977-78 में जाकर बना
कभी व्यवधान न आने पावें, इसकी व्यवस्था वन्द, माताजी के तरफ से की गई थी। कभी-कभी अतिरिक्त जप कर वन्द, माताजी अखण्ड दीपक का दायित्व किसी एक बालिका या शारदा देवी के जिम्मे छोड़ बालिकाओं को हरिद्वार घुमाने अथवा संत सरोवर के गंगा तट पर ले जाने का क्रम भी बनाए रखती थी। यह सारा विवरण इसलिये लिखा जा रहा है ताकि आज के दो हजार के स्थायी एवं तीन हजार प्रतिदिन के आगंतुक शिविरार्थी, दर्शनार्थी लोगों से भरे भीड़ वाले शाँतिकुँज के प्रारम्भिक स्वरूप को लोग समझ सकें। जप की आधारशिला पर रखी गयी शाँतिकुँज की नींव इतनी मजबूत और प्राण -ऊर्जा से ओतप्रोत है कि इसकी स्थापना को कोई भी डगमगा नहीं सकता
इन पचास वर्षों में पूज्यवर का जीवन अनेक अलौकिक अनुभूतियों से गुजरा था। अखण्ड दीपक के आलोक में अनगिनत प्रेरणाएँ उनके अर्न्तगगन में उतरी थीं। इन पचास सालों में न सिर्फ दीपशिखा अखण्डित रही, बल्कि साधना का क्रम भी अखण्डित रहा। आँवलखेड़ा की छोटी-सी कोठरी में प्रज्वलित किया गया दीपक, अपने मथुरा निवास की अवधि पुरी करके अब तक शाँतिकुँज में प्रतिष्ठित हो चुका था
अविनाशी चेतना के रूप में आत्ता सदा अजर-अमर है। परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्मसत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहें। वह हम लोगों के लिए मत्स्यवेध जैसा लक्ष्यवेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी
छोटी -छोटी बच्चियाँ जो जून माह में चार की संख्या में थी एवं मई 1972 में जिनकी संख्या जाकर 24 हो गई थी, उन्हें यहां 24 घंटे अखण्ड जप सम्पन्न करना था। गायत्री महाशक्ति की प्रतिमा के समक्ष जल रहे अखण्ड दीपक,जो कि परम पूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्ज्वलित किया गया था, के समक्ष दिनभर एवं रात्रि को तीन पातियों में समय विभाजन कर निरंतर जप की व्यवस्था बनाई गयी थी। शुरुआत के कुछ दिनों बाद से वर्ष में यह कार्य कुमारी पुष्पा, आदर्श, कमला, बसंती, निर्मला, रेणुका, सरोज, सुधा एवं उर्मिला, नामक नो बालिकाओं, जो भरत भर के अपने वर्षों से जुड़े कार्यकर्त्ताओं की पुत्रियाँ थी, के माध्यम से प्रारम्भ हुआ था। प्रातः काल एवं सायंकाल की आरती बन्द, माताजी सहित नौ बालिकाएँ एवं दो उनकी देख-रेख करनी वाली बहनों द्वारा सम्पन्न होती थी
शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा, पर क्षणभर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक का ज्वलन्त ज्योति में समा जाएँगे जिसके आधार पर अखण्ड ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म-चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे व इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत स्थिति में रहे हैं
उसमें फूलों को उसी वर्ष लगा दिया है, खाने को फल -शाक, पहनने को दो कैरी कपास जिसका सूत कातकर तन ढक ले। एक गाय जिसका घी अखण्ड दीपक के लिए मिल जाए व छाछ आहार में प्रमुख हो। एक कर्मचारी पेड़-पौधों, गाय को संभालने हेतु और रहने को चार कुटीर। ये सारी व्यवस्थाएँ धीरे-धीरे ढाई वर्ष में पूरी हो जायेंगी
बीच-बीच में मनोरंजन हेतु कुछ ऐसी मनोरंजक अंताक्षरियों, खेल-चर्चाओं अथवा बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों का समावेश उनका मन बहलाने के लिए करती। इस बीच गायत्री मंदिर, जो शाँतिकुँज का सबसे पहला मंदिर है जहाँ पर अखण्ड दीपक स्थित है, में जन निरंतर चलता रहता था। कभी व्यवधान न आने पावें, इसकी व्यवस्था वन्द, माताजी के तरफ से की गई थी। कभी-कभी अतिरिक्त जप कर वन्द, माताजी अखण्ड दीपक का दायित्व किसी एक बालिका या शारदा देवी के जिम्मे छोड़ बालिकाओं को हरिद्वार घुमाने अथवा संत सरोवर के गंगा तट पर ले जाने का क्रम भी बनाए रखती थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
परमपूज्य गुरुदेव के निर्देश वे सुनते रहेंगे एवं इस आधे घण्टे की अवधि में विशिष्ट प्राण संचार का क्रम चलेगा। तत्पश्चात् दिव्य औषधि कल्क सेवन अखण्ड दीपक व गुरुसत्ता की पादुकाओं को नमन का क्रम चलेगा। प्रयोग विशिष्ट प्राणायाम-मुद्राएँ बन्ध व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप सम्पन्न होने के बाद सभी चौबीस कुण्डी यज्ञशाला में हवन करेंगे। तत्पश्चात् ज्ञानयोग प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष संदेश वरिष्ठ प्रतिनिधियों के माध्यम से श्रवण करेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
शान्तिकुँज में गोघृत के अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री जप के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की एक शृंखला चल रही है। इन दिनों 10 कन्याओं द्वारा यह क्रम चल रहा है। छः वर्ष में 24 महापुरश्चरण पुरे होंगे
शान्तिकुँज में अखण्ड दीपक पर 24 गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला अखण्ड जब के रूप में चल रही है। उसे कुमारी कन्याओं द्वारा चलाया जा रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
उनके द्वारा की हुई या कराई हुई साधना तथा-कथित ब्राह्मणों की तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही फलप्रद बैठती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर शान्ति-कुञ्ज में संकल्पित 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण 24 की संख्या में अखण्ड दीपक पर अखण्ड जप के रूप में सम्पन्न करने का जो निश्चय किया गया उसके लिए कन्याएं ही उपयुक्त माध्यम चुनी गईं। तदनुसार गत वर्ष से वह साधना चल पड़ी और बराबर निर्बाध गति से चल रही है, उससे उत्पन्न शक्ति अंश निरन्तर परिवार की भौतिक एवं आत्मिक सहायता के लिये वितरित किया जाता रहता है
इस प्रकार वह चौबीस वर्ष वाली साधना छह वर्ष में सम्पन्न करने की बात निश्चित हुई। अखण्ड दीपक अपना 46 वर्ष पूर्व से ही जलता चला आ रहा है। उसे भी कम से कम हम लोग अपने जीवन काल में तो जलने ही देना चाहते हैं। देखने में यह बाहरी प्रकाश देने वाला लगता है पर हम लोगों ने कितना अन्तः प्रकाश इसके माध्यम से पाया है, यह लिखा या बताया नहीं जा सकता
अपने ऊपर कुछ इसी तरह की बीती। कुमारी कन्याओं द्वारा शान्ति कुञ्ज में अखण्ड दीपक पर अखण्ड जप ही इन दिनों अपना एक मात्र उपार्जन है। थोड़ा बहुत स्वयं भी कर लेती हूँ। शेष समय तो इतने बड़े परिवार को समुचित स्नेह और प्रकाश देने का उत्तरदायित्व वहन करने में ही लग जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
इन दिनों कन्याओं को अखण्ड दीपक पर तप साधना इसलिए भी कराई जा रही है कि अगले दिनों अवतरित होने वाली- महान आत्माओं का तेज वे अपने गर्भ में धारण कर सकें। अञ्जनी, कौशल्या, देवकी, यशोदा, कुन्ती, मदालसा, द्रौपदी आदि महान महिलाओं ने पूर्व जन्मों में तप साधना करके ही वह शक्ति प्राप्त की थी कि अपनी गोदी में देवताओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। पार्वती के तप का ही प्रभाव था कि उनकी गोदी में समस्त देवताओं में पूजा अग्रणी गणेश का परिपोषण हो सका
जिस प्रकार गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना के अवसर पर सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ, 2400 तीर्थों के जल, चौबीस करोड़ मन्त्र लेखन एवं अखण्ड यज्ञाग्नि से प्राणवान बनाया गया था। उसी प्रकार अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री महापुरश्चरण कुमारी कन्याओं के माध्यम से यहाँ भी सम्पन्न किये जा रहे हैं। गुरुदेव ने 24 वर्षों में जो साधना की थी उसी को यहाँ अखण्ड क्रम में छह वर्षों में पूरा कर दिया जायगा। इन दिनों इस प्रयोजन के लिए यहाँ 20 कन्याएं रहती हैं और तप साधना के अतिरिक्त महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त करती हैं
युग नेतृत्व के लिए जीवन मुक्त आत्माओं के अवतरण के लिए इस प्रकार की पृष्ठभूमि बनाई जानी आवश्यक भी है। शान्ति-कुञ्ज का अखण्ड दीपक पर चलने वाला महा पुरश्चरण जहाँ युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की कितनी ही कठिनाईयों को हल करने की शक्ति उत्पन्न कर रहा है, वहाँ कन्याओं की शिक्षा के अतिरिक्त उनमें उत्कृष्ट स्तर की क्षमता भी उत्पन्न कर रहा है। इस प्रयोजन के पीछे भी असाधारण दूरदर्शिता पूर्ण उद्देश्य छिपा पड़ा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
पिछले दिनों परिवार के लिए जितना अनुदान आवश्यक था वह दिया तो पूरा गया पर उसका उपार्जन उतना न हो सका। अखण्ड दीपक पर कुमारी कन्याओं के माध्यम से शान्तिकुँज में जो अखण्ड गायत्री जप-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों के निमित्त चल रहा है, उसके अतिरिक्त अपनी उपासना थोड़ी सी ही हो पाती है। अधिकाँश समय तो पत्रिकाओं के सम्पादन, पत्रों के उत्तर तथा आगन्तुकों के स्वागत सत्कार में ही निकल जाता है। गुरुदेव ने अपनी सारी शक्ति विश्व महत्व के कार्यों में पूरी तरह लगा रखी थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
अखण्ड दीपक पर पुरश्चरणों की शृंखला सम्पन्न करते हुए उन्होंने भावना क्षेत्र में यह निष्ठा परिपक्व की कि जीवन को ज्वलन्त दीप शिखा की तरह अन्तरंग एवं बहिरंग क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न करने के लिये तिल-तिलकर जलते रहने की प्रक्रिया व्यवहार में लाई जानी चाहिये यदि दीप उपकरण के साथ-साथ वे आत्म-ज्योति को प्रकाशवान बनाने का लक्ष्य सामने रखकर न चले होते तो उनकी अखण्ड-ज्योति भी मात्र रोशनी पैदा करने का तुच्छ सा प्रयोजन पूरा कर सकी होती
शान्तिकुञ्ज (हरिद्वार) में कुमारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक पर अखण्ड गायत्री जप कराया जा रहा है। 24 लक्ष के 24 पुरश्चरण 6 वर्षों में पूरे होंगे। यह अनुष्ठान ब्राह्मणों की अपेक्षा कन्याओं द्वारा इसलिए कराया जा रहा है कि कुमारिकाओं की सात्विकता से अभीष्ट परिणाम अधिक सुनिश्चित रूप से सफल होंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
उन दिनों जप के समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी, अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है। नित्यकर्म में पंचयज्ञ, बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
गंगा की गोद और हिमालय की छाया में आत्मोत्कर्ष का सुयोग अधिक अच्छी तरह बनता है। चित्र तीर्थों की तरह हिमालय और गंगा का अद्भुत देवालय भी यहाँ प्रतिष्ठित है अखण्ड दीपक, अखण्ड अग्नि, नित्य का यज्ञ, वर्ष में 24 करोड़ जप का संकल्प, गायत्री में रहने से पुरातन काल की तीर्थ परम्परा की छोटी किन्तु प्रभावी झाँकी उपलब्ध होती है। मार्गदर्शन, समाधान या अनुदान के लिए भी अभी तो ऐसी आत्माएँ भी यहाँ मौजूद हैं जिन्हें जीवन्त तीर्थ कहा जा सके। उत्तराखण्ड की यात्रा पर जाने वाले अगणित व्यक्ति सर्वप्रथम इन जीवित तीर्थों का आशीर्वाद प्राप्त करके अपनी यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न होने, सफल रहने का विश्वास लेकर आगे प्रयाण करते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
5॥ बजे सभी माताजी के पास पहुँचते हैं। अखण्ड दीपक के दर्शन, औषधि कल्पपेय की एक प्याली, प्रज्ञापेय का एक कप-इतना प्रसाद ग्रहण करने के इस कृत्य में प्रायः आधा घण्टा लग जाता है। इसके उपरान्त छः से आठ तक का साधना क्रम चलता है। इसी बीच यज्ञ में सम्मिलित होने की अपनी पारी भी निपट जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
उस दिन घी का अखण्ड दीपक जलाया जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
20 जून 71 को मथुरा छोड़कर जब हम लोग हरिद्वार आये तो शान्ति कुंज का उद्घाटन अखण्ड दीपक पर कन्याओं द्वारा महापुरश्चरण के रूप में आरम्भ किया गया। इस धर्मानुष्ठान के पीछे यही घोषणा थी कि इस भूमि से भविष्य में किन गति विधियों का संचालन होना है। इसके बाद एक-एक करके कन्या शिक्षा-योजना प्रशिक्षण सत्र आदि की व्यवस्था क्रमशः बनती चली गई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
आचार्यजी चाहते हैं कि उनकी 30 वर्ष की कमाई का प्रतीक अखण्ड दीपक अभी 10 साल और जलता रखा जाय और 40 वर्ष का जो दीप अनुष्ठान होता है वह पूर्ण किया जाय। जिस प्रकार अखण्ड अग्नि की स्थापना पर उस अग्नि का भोजन यज्ञ रूप में नित्य होना आवश्यक है। उसी प्रकार अखण्ड दीपक के आगे भी उसका भोजन कम से कम 60 माला जप नित्य होना आवश्यक है
जिस प्रकार अखण्ड अग्नि की स्थापना पर उस अग्नि का भोजन यज्ञ रूप में नित्य होना आवश्यक है। उसी प्रकार अखण्ड दीपक के आगे भी उसका भोजन कम से कम 60 माला जप नित्य होना आवश्यक है। गायत्री तपोभूमि में अखण्ड अग्नि रहती हैं। वहाँ एक हजार आहुतियों का हवन नित्य होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
तैयारी पूर्ण होने पर इसे आरंभ कर दूँगी। और दश वर्ष में 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण इसी अखण्ड दीपक की छाया में पूरे करने में संलग्न रहूँगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
गुरुदेव को आत्मबोध का प्रकाश इसी शुभ मुहूर्त में मिला था। उन्होंने अपनी 24 वर्षीय गायत्री पुरश्चरण साधना अखण्ड दीपक पर उसी दिन आरम्भ की थी। इतना ही नहीं वे हर वसन्त पंचमी पर एक अभिनव दिव्य प्रकाश प्राप्त करते रहे और इस आधार पर अगले एक वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करते रहे। एक-एक कदम हर वसन्त पंचमी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इतनी लम्बी यात्रा की और लक्ष्य के समीप तक पहुँचे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
(3) अखण्ड दीपक एवं गायत्री पुरश्चरण श्रृंखला को गतिशील रखकर कष्टपीड़ितों की सहायता एवं परिजनों को प्यार - प्रकाश का अनुदान

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से अधिक प्यारा होता है अपनी अन्धश्रद्धा कहिये अनुशासन प्रियता, या जीवन की जो दिशा निर्धारित कर दी गई, कार्य पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये। अखण्ड दीपक की साधना कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आती है। जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्व है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो वह प्राण प्रिय ही बन गया
हो सकता है अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का स्वरूप हो। धूप बत्तियों का जलना, हवन सामग्री की- जप मंत्रों धारण की और दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की कोई स्वसंचालित प्रक्रिया बन जाती हो। हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि जल का संयोग रेल इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करना हो
हो सकता है अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का स्वरूप हो। धूप बत्तियों का जलना, हवन सामग्री की- जप मंत्रों धारण की और दीपक घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की कोई स्वसंचालित प्रक्रिया बन जाती हो। हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि जल का संयोग रेल इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करना हो
उस अवधि में सब कुछ सामान्य चला, असामान्य एक ही था- हमारा गौ घृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीपक। पूजा की कोठरी में वह निरन्तर जलता रहता। इसका वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था कुछ ठीक से कह नहीं सकते
हम अज्ञातवास गये थे- अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्म पत्नि संजोये रखेगी। यदि एकाकी रहे होते पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी अखण्ड दीपक संजोये रखना कठिन था। अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्म पत्नी ने असाधारण योगदान दिया है
बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर ही बाहर जलता दीखा, पीछे अनुभूति बदली और लगा कि हमारे अन्तःकरण में यही प्रकाश ज्योति ज्यों की त्यों जलती है और जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योर्तिमय हो रहा है। शरीर, मन और आत्मा में- स्थूल सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता का ध्यान करते रहे हैं सम्भवतः वह इस अखण्ड दीपक की ही प्रतिक्रिया रही होगी। सर्वत्र प्रकाश का समुद्र लहलहा रहा है और हम तालाब की मछली की तरह उस ज्योति-सरोवर में क्रीडा-कलोल करते विचरण करते हैं। इन अनुभूतियों, आत्मबल, दिव्य दर्शन और अन्तः उल्लास को विकासमान बनाने में इतनी सहायता पहुँचाई जिसका कुछ उल्लेख नहीं किया जा सकता
यदि एकाकी रहे होते पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी अखण्ड दीपक संजोये रखना कठिन था। अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्म पत्नी ने असाधारण योगदान दिया है
अखण्ड दीपक की साधना कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आती है। जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्व है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो वह प्राण प्रिय ही बन गया। 24 वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा सो उसे आजीवन चालू रखा जायेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
वह उसके अंतराल में बसने वाला निराकार स्वरूप है। इसी का साकार स्वरूप है 'अखण्ड ज्योति' जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बनाकर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह मन जाना चाहिए की खंडित न होने वाली निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक को कलेवर प्रदान किया गया अखण्ड ज्योति के रूप में। "

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
प्राचीनकाल में ऐसे अनेक अखण्ड दीपकों के प्रमाण मिले है, जो सैकड़ों वर्षों से जलते आ रहे थे। मूर्धन्य इतिहासवेत्ता कैमडन ने खुदाई में मिले ऐसे अनेक जलते दीपकों का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है। सेंट आबस्टाइन ने अपनी संस्मरण पुस्तक में लिखा है कि वीनस देवी के मन्दिर में एक ऐसा दीपक था, जिस पर तेज हवा और वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
आश्विन कृष्ण संवत् १९८२, २० सितंबर १९२६ को प्रातः ८ बजे साँवलिया बोहरे (आगरा) के श्री जसवंतराय के घर जन्मी परमवंदनीया माताजी एक दैवीसत्ता- शक्ति के रूप में ही अवतरित हुई थीं। यह मात्र संयोग ही नहीं है कि पंद्रह वर्ष की आयु में उसी वर्ष की आयु में उसी वर्ष संवत् पर्व पर उनके भावी जीवनसाथी- उनके आराध्य एवं गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने भी अपने अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन के माध्यम से अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के लगभग १६ मील दूर स्थित आँवलखेड़ा ग्राम में दर्शन किए एवं अपने तीनों जन्मों की जानकारी प्राप्त की थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि उसी वर्ष श्री अरविंद ने भागवत चेतना का सिद्धिवर्ष इसे घोषित किया था। इस ये सारे असाधारण स्तर के संयोग बताते हैं कि ऋषियुग्म के रूप में एक दैवी चैतन्य-शक्ति हम सबको मार्गदर्शन करने आई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
तब से सतत् जल रहा यह अखण्ड दीपक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सतत् जाज्वल्यमान रह आगामी वर्ष अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना। इस ऊर्जाकेन्द्र को गुरुसत्ता ने अंतस् की पिटारी में न बंद कर जन-जन के अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप में बारह वर्ष के अन्दर 1937-38 में प्रस्तुत कर दिया गया। इस पत्रिका का भी तिरसठवाँ वर्ष आगामी माह से आरंभ होने जा रहा है
अखण्ड ज्योति प्रतीक रूप में स्थापना है- खंडित न होने वाले, निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान ‘अखण्ड दीपक’ के कलेवर की, जिसकी स्थापना 1926 में एक अखण्ड यज्ञ के रूप में की गई थी। तब से सतत् जल रहा यह अखण्ड दीपक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सतत् जाज्वल्यमान रह आगामी वर्ष अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना
अखण्ड ज्योति प्रतीक रूप में स्थापना है- खंडित न होने वाले, निरंतर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान ‘अखण्ड दीपक’ के कलेवर की, जिसकी स्थापना 1926 में एक अखण्ड यज्ञ के रूप में की गई थी। तब से सतत् जल रहा यह अखण्ड दीपक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सतत् जाज्वल्यमान रह आगामी वर्ष अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। जिस प्रयोजन से अखण्ड दीपक के समक्ष चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की गई थी वह था विश्वमानव की वर्तमान चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना। इस ऊर्जाकेन्द्र को गुरुसत्ता ने अंतस् की पिटारी में न बंद कर जन-जन के अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप में बारह वर्ष के अन्दर 1937-38 में प्रस्तुत कर दिया गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
पूरा आश्रम, शोध केंद्र एवं विश्वविद्यालय परिसर उनने देखा एवं भावविभोर होकर वे गए। सूदरलैंड दंपत्ति ने अखण्ड दीपक के दर्शन कर गुरुसत्ता का प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
परमपूज्य गुरुदेव के सदैव यही निर्देश रहे कि उनकी सत्ता सजल−श्रद्धा प्रखर−प्रज्ञा के रूप में, देवात्मा हिमालय व स्मृति उपवन के रूप में, अखण्ड दीपक की जाज्वल्यमान ज्योति के रूप में तथा उनके द्वारा लिखे गए विचारों के रूप में, उनके साहित्य में ही सदा मौजूद रहेगी। इसीलिए किसी को भी यह नहीं करना चाहिए कि अनुकरण कर हम भी ऐसी मूर्तियों की स्थापना अपने यहाँ करें। इससे गुरुसत्ता के निर्देशों की अवमानना होगी तथा उनके ज्ञानयज्ञ अभियान में बाधा पड़ेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
गुरुदेव के साथ ममतामयी माँ ने शान्तिकुञ्ज के लिए प्रस्थान किया। साथ में वर्षों की तप-साधना से सिद्ध अखण्ड दीपक को सम्हाले हुए दो-तीन कार्यकर्त्ता थे। यह यात्रा भी समाप्त हुई। शान्तिकुञ्ज में गुरुदेव कुछ दिन रहे भी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
सहस्रकुंडीय महायज्ञ से भी बड़ा यह समागम था व लाखों व्यक्तियों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें विदाई दी। वे तथा वंदनीया माताजी एवं उनका अखण्ड दीपक शाँतिकुँज आ गए, जो अभी बनकर मात्र रहने योग्य स्थिति में ही था। नौ दिन तक वे घनिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं वंदनीया माताजी को महत्वपूर्ण निर्देश देते रहे एवं दसवें दिन रात्रि 2 बजे उठकर बिना किसी को बताए अपने गन्तव्य पर चले गये
इसके प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी एवं समष्टिगत प्रवाह से वे तभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार नवयुग का सूत्रपात होना है। “अखण्ड दीपक ही समय-समय पर पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवी मार्गदर्शन को तुम तक पहुँचायेगा, अतः जहाँ भी रखो, इसे अपने पास पूजा गृह में रखना। इसका दर्शन मात्र लोगों का कल्याण कर देगा
यहाँ यह सब विस्तार से इसलिए लिखा गया है कि जो परिजन उस अखण्ड दीपक के दर्शन यहाँ आकर करते है, उसके मूलभूत तत्वदर्शन व परोक्ष सिद्धि के स्वरूप में भी समझें। अनुकरण में वे अपने यहाँ दीप जला लें तो फिर उसे “सिद्ध ज्योति” जैसा बनाने का पुरुषार्थ भी करें। यदि यह न बन पड़े जो कि असंभव ही है क्योंकि दीप जलाने के साथ जो तप साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है
अखण्ड अग्नियों व दीपकों का असाधारण आध्यात्मिक महत्व होता है। इस लेख में जहाँ से शुरुआत की गई थी, इसी प्रसंग को आगे बढ़ाने हैं कि जन सामान्य अनुकरण की प्रवृत्ति अपनाते हुए सारी सिद्धि का स्रोत एक दृश्य उपचार को मानते हुए अखण्ड दीपक या अग्नि प्रज्ज्वलित तो कर देते हैं पर उसका निर्वाह नहीं कर पाते। दीपक तभी सिद्ध हो पाता है जब तप साधना का पोषण सुपात्र साधन द्वारा किया जा रही हो। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है कि किसी और से करा लिया जाय
पूज्य गुरुदेव ने इसी के प्रकाश में सतत् लेखनी की साधना तथा अपनी उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा
जप-अनुष्ठान भी स्वयं करना पड़ता है, तप-तितीक्षा भी स्वयं करनी पड़ती है तथा आत्मशोधन को अनिवार्य अंग मानते हुए उसे सतत् निभाना पड़ता है। यही कार्य पूज्य गुरुदेव व वंदनीया माता जी ने किया तथा आज भी वह अखण्ड दीपक जो 64 वर्षों से जल रहा है, शांतिकुंज में स्थापित है। समस्त प्रेरणाओं व सिद्धियों का वह स्रोत है। उसके सामने अभी भी अखण्ड जप चलता है
जो तीन प्रमुख काम गुरुदेव वंदनीया माताजी को सौंप गए थे, उनमें पहला था-”अखण्ड घृतदीप को दस वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय। पहले यह अखण्ड दीपक मात्र 24 पुरश्चरणों के लिए था पर अब कार्य पूरा हो जाने पर भी उसका विसर्जन नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार चालीस दिन में एक गायत्री अनुष्ठान (सवालक्ष का) पूर्ण हो जाता है, इसी प्रकार चालीस वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृतदीप भी “सिद्ध ज्योति” बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका एवं सारे परिवार ने क्रमशः चौबीस घण्टे जागरण रखकर उसे जलाये रखा तो अब दस वर्ष के लिए ही इस अधूरा क्यों छोड़ा जाय?” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1959 पृष्ठ 6,7,8)
बाद में मोदी जी सन 1950 में गुरुदेव के पास घीयामण्डी आए। गुरुदेव ने अखण्ड दीपक के पास ले जाकर कहा मेरी “अखण्ड-ज्योति” यह है। इस दिव्य प्रकाश ने ही वह मनोबल प्रदान किया है, जो प्रकाशन का मूल प्राण है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
सभी उपक्रम बंध मुद्रा को छोड़कर सामूहिक रूप से सम्पन्न होंगे। स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर के परिष्कार के लिए जड़ी बूटी कल्क अखण्ड दीपक को प्रणाम करते समय दिए जाने की व्यवस्था की गयी है। नौ दिन में यह प्रति तीन दिन में भिन्न-भिन्न प्रकार का साधक के परीक्षण के उपरान्त पाई गई स्थिति के अनुरूप होगा। विशिष्टता स्थूलता वनौषधि की कम व उसकी कारण शक्ति के जाग्रत रूप की अधिक है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
सहस्रकुंडीय महायज्ञ से भी बड़ा यह समागम था व लाखों व्यक्तियों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें विदाई दी। वे तथा वंदनीया माताजी एवं उनका अखण्ड दीपक शाँतिकुँज आ गए, जो अभी बनकर मात्र रहने योग्य स्थिति में ही था। नौ दिन तक वे घनिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं वंदनीया माताजी को महत्वपूर्ण निर्देश देते रहे एवं दसवें दिन रात्रि 2 बजे उठकर बिना किसी को बताए अपने गन्तव्य पर चले गये
इसके प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी एवं समष्टिगत प्रवाह से वे तभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार नवयुग का सूत्रपात होना है। “अखण्ड दीपक ही समय-समय पर पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवी मार्गदर्शन को तुम तक पहुँचायेगा, अतः जहाँ भी रखो, इसे अपने पास पूजा गृह में रखना। इसका दर्शन मात्र लोगों का कल्याण कर देगा
यहाँ यह सब विस्तार से इसलिए लिखा गया है कि जो परिजन उस अखण्ड दीपक के दर्शन यहाँ आकर करते है, उसके मूलभूत तत्वदर्शन व परोक्ष सिद्धि के स्वरूप में भी समझें। अनुकरण में वे अपने यहाँ दीप जला लें तो फिर उसे “सिद्ध ज्योति” जैसा बनाने का पुरुषार्थ भी करें। यदि यह न बन पड़े जो कि असंभव ही है क्योंकि दीप जलाने के साथ जो तप साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है
अखण्ड अग्नियों व दीपकों का असाधारण आध्यात्मिक महत्व होता है। इस लेख में जहाँ से शुरुआत की गई थी, इसी प्रसंग को आगे बढ़ाने हैं कि जन सामान्य अनुकरण की प्रवृत्ति अपनाते हुए सारी सिद्धि का स्रोत एक दृश्य उपचार को मानते हुए अखण्ड दीपक या अग्नि प्रज्ज्वलित तो कर देते हैं पर उसका निर्वाह नहीं कर पाते। दीपक तभी सिद्ध हो पाता है जब तप साधना का पोषण सुपात्र साधन द्वारा किया जा रही हो। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है कि किसी और से करा लिया जाय
पूज्य गुरुदेव ने इसी के प्रकाश में सतत् लेखनी की साधना तथा अपनी उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा
जप-अनुष्ठान भी स्वयं करना पड़ता है, तप-तितीक्षा भी स्वयं करनी पड़ती है तथा आत्मशोधन को अनिवार्य अंग मानते हुए उसे सतत् निभाना पड़ता है। यही कार्य पूज्य गुरुदेव व वंदनीया माता जी ने किया तथा आज भी वह अखण्ड दीपक जो 64 वर्षों से जल रहा है, शांतिकुंज में स्थापित है। समस्त प्रेरणाओं व सिद्धियों का वह स्रोत है। उसके सामने अभी भी अखण्ड जप चलता है
जो तीन प्रमुख काम गुरुदेव वंदनीया माताजी को सौंप गए थे, उनमें पहला था-”अखण्ड घृतदीप को दस वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय। पहले यह अखण्ड दीपक मात्र 24 पुरश्चरणों के लिए था पर अब कार्य पूरा हो जाने पर भी उसका विसर्जन नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार चालीस दिन में एक गायत्री अनुष्ठान (सवालक्ष का) पूर्ण हो जाता है, इसी प्रकार चालीस वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृतदीप भी “सिद्ध ज्योति” बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका एवं सारे परिवार ने क्रमशः चौबीस घण्टे जागरण रखकर उसे जलाये रखा तो अब दस वर्ष के लिए ही इस अधूरा क्यों छोड़ा जाय?” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1959 पृष्ठ 6,7,8)
बाद में मोदी जी सन 1950 में गुरुदेव के पास घीयामण्डी आए। गुरुदेव ने अखण्ड दीपक के पास ले जाकर कहा मेरी “अखण्ड-ज्योति” यह है। इस दिव्य प्रकाश ने ही वह मनोबल प्रदान किया है, जो प्रकाशन का मूल प्राण है